Iran War Impact: पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध का असर भारत पर पड़ सकता है। एनर्जी की कीमतें बढ़ने से RBI FY27 में रेपो रेट 25-50 बेसिस प्वाइंट बढ़ा सकता है। जानें पूरी खबर।
नइ दिल्ली, 3 अप्रैलः क्या पश्चिम एशिया (Middle East) में चल रहा युद्ध आपके होम लोन की ईएमआई (EMI) बढ़ा सकता है? क्या यह भारतीय कंपनियों के मुनाफे और विस्तार योजनाओं पर पानी फेर सकता है? फिलहाल जो हालात नजर आ रहे हैं, उन्हें देखकर तो ऐसा ही लगता है। पश्चिम एशिया में जारी बयानबाजी और भू-राजनीतिक तनाव के बीच, यह माना जा रहा है कि यह युद्ध अभी लंबा खिंचेगा।
मनीकंट्रोल (Moneycontrol) को दिए गए एक खास इंटरव्यू में, मशहूर वेल्थ मैनेजमेंट फर्म ‘क्लाइंट एसोसिएट्स' के को-फाउंडर हिमांशु कोहली ने इस स्थिति को लेकर कई अहम खुलासे किए हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि अगर कच्चे तेल (Crude Oil) और एनर्जी की कीमतों में उछाल के कारण महंगाई ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) वित्त वर्ष 27 (FY27) में ब्याज दरों में 25 से 50 बेसिस प्वाइंट (bps) तक की बढ़ोतरी कर सकता है। इसके अलावा, मौजूदा अनिश्चितता के माहौल में बड़ी कंपनियां अपने पूंजीगत खर्च (Capex) यानी विस्तार से जुड़े फैसलों को कुछ समय के लिए टाल सकती हैं।
आइए इस पूरी स्थिति को आसान भाषा में विस्तार से समझते हैं और जानते हैं कि आने वाले समय में अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर इसका क्या असर पड़ने वाला है।
ईरान और पश्चिम एशिया युद्ध: क्या जल्द निकलेगा कोई समाधान?
इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस युद्ध का कोई अंत करीब है? हिमांशु कोहली के अनुसार, दोनों पक्षों की तमाम कोशिशों के बावजूद, संघर्ष अपने 5वें सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और तनाव अब भी चरम पर है।
खाड़ी देश (Gulf Countries), जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था ही कच्चे तेल के निर्यात पर टिकी हुई है, इस स्थिति से सबसे ज्यादा नुकसान उठा रहे हैं। हालांकि, दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापार मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) से जहाजों के गुजरने को लेकर कुछ छूट (Waivers) पर बातचीत के शुरुआती संकेत जरूर मिले हैं, लेकिन अभी किसी स्थायी समाधान की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। देशों के बीच चल रही तीखी बयानबाजी को देखते हुए यही लगता है कि यह युद्ध निकट भविष्य में खत्म नहीं होने वाला है और यह और ज्यादा भड़क सकता है।
अर्थव्यवस्था और महंगाई पर लंबे युद्ध की मार
इतिहास गवाह है कि कोई भी युद्ध जब लंबा खिंचता है, तो वह किसी भी देश के लिए फायदेमंद नहीं होता। समय बीतने के साथ-साथ यह कमोडिटी बाजार (Commodity Market) के रास्ते सीधे वित्तीय बाजारों (Financial Markets) में तबाही मचाना शुरू कर देता है।
अगर युद्ध लंबा चलता है, तो कच्चे तेल और अन्य कमोडिटीज की सप्लाई चेन टूट जाती है। इससे ग्लोबल मार्केट में इनकी कीमतें आसमान छूने लगती हैं और सीधे तौर पर महंगाई बढ़ने लगती है। जब महंगाई बढ़ती है, तो आम उपभोक्ता चीजों को खरीदना कम कर देता है। इस तरह, लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष मांग (Demand) को खत्म कर देता है, जिसका सीधा और घातक असर देश की अर्थव्यवस्था, कंपनियों की कमाई और आम लोगों की जेब पर पड़ता है।
आमतौर पर देखा गया है कि युद्ध का शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था पर सबसे ज्यादा असर संघर्ष शुरू होने के 2 से 6 हफ्तों के भीतर रहता है। हम पहले ही 5वें हफ्ते में हैं, इसलिए बाजार अब हर छोटी-बड़ी खबर पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं।
कंपनियों की कमाई पर असर: Q4FY26 बनाम Q1FY27
हिमांशु कोहली ने Q4FY26 (वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही) के अर्निंग्स (कमाई) आंकड़ों को देखते हुए कहा कि हाल की घटनाओं के कारण, सभी कंपनियों का मैनेजमेंट अब बेहद सतर्क हो गया है। कंपनियों की ओर से आने वाली तिमाहियों के लिए जो कमेंट्री (टिप्पणियां) आएंगी, वो काफी सधी हुई और सावधान रहने वाली होंगी।
अगर हम रूस-यूक्रेन युद्ध के समय की घटनाओं को याद करें, तो कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर कंपनियों के मुनाफे (मार्जिन) पर तुरंत नहीं, बल्कि एक तिमाही की देरी से पड़ता है।
Q4FY26 पर असर: चूंकि यह नया संघर्ष मार्च में शुरू हुआ है और सरकार व तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने कच्चे तेल के झटके को काफी हद तक खुद ही सह लिया है, इसलिए Q4FY26 की कमाई और मार्जिन पर इसका कोई बहुत बड़ा या विनाशकारी असर देखने को नहीं मिलेगा। असर बेहद मामूली होगा।
Q1FY27 और Q2FY27 पर असर: असली चिंता आगे की है। अगर युद्ध नहीं रुकता है, तो Q1FY27 और Q2FY27 में कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है।
किन सेक्टर्स पर पड़ेगा सबसे बुरा असर?
अगर एनर्जी महंगी होती है, तो इसका सबसे बुरा प्रभाव उन कंपनियों पर पड़ता है जिनका कच्चा माल (Raw Material) तेल या एनर्जी से जुड़ा है। हिमांशु कोहली के मुताबिक, नीचे दिए गए सेक्टर्स सबसे ज्यादा खतरे में हैं:
मैटेरियल्स (Materials): इसमें केमिकल्स, पेंट्स, फर्टिलाइजर्स, सीमेंट और मेटल्स शामिल हैं। पेंट्स और केमिकल्स सीधे तौर पर कच्चे तेल पर निर्भर हैं।
OMCs (तेल विपणन कंपनियां): महंगे कच्चे तेल को सस्ते में बेचने के दबाव के कारण इनके मार्जिन घट सकते हैं।
एयरलाइंस (Airlines): विमान ईंधन (ATF) महंगा होने से इनकी लागत काफी बढ़ जाएगी।
लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन: डीजल महंगा होने से माल ढुलाई महंगी होगी।
यूटिलिटीज और कंज्यूमर स्टेपल्स: रोजमर्रा के सामान (FMCG) बनाने वाली कंपनियों की पैकेजिंग और ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ेगी।
इसके अलावा, सबसे बड़ी चिंता यह है कि मौजूदा अनिश्चितता के कारण कंपनियां अपने नए प्रोजेक्ट्स और पूंजीगत खर्च (Capex) से जुड़े फैसलों को फिलहाल रोक सकती हैं या टाल सकती हैं।
RBI और ब्याज दरें: 2026 और FY27 का आउटलुक
हम एक नए वित्त वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने अब बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द हैं, क्योंकि यह महंगाई के जोखिम को बहुत तेजी से बढ़ाती हैं।
हालांकि, भारत सरकार ने तेल के झटके का एक बड़ा हिस्सा खुद पर लेकर आम जनता को राहत देने की कोशिश की है। लेकिन इससे राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) की चिंताएं बढ़ गई हैं। इसी चिंता और सरकार की ओर से क्रेडिट (कर्ज) की बढ़ती मांग के कारण बॉन्ड मार्केट में यील्ड सख्त हो रही है। यही वजह है कि बेंचमार्क 10-वर्षीय G-Sec यील्ड हाल ही में 7 फीसदी के आंकड़े को पार कर गई है।
क्या RBI बढ़ाएगा रेपो रेट?
राहत की बात यह है कि भारत इस कठिन दौर में तब दाखिल हुआ, जब घरेलू महंगाई काफी हद तक कंट्रोल में थी (फरवरी 2026 में रिटेल महंगाई दर महज 3.21 फीसदी थी)। इसी वजह से, यह उम्मीद की जा रही है कि RBI निकट भविष्य में अपनी ब्याज दरों को स्थिर रखेगा और कोई बदलाव नहीं करेगा।
लेकिन, हिमांशु कोहली ने साफ चेतावनी दी है कि अगर एनर्जी की कीमतों में तेजी के कारण महंगाई का दायरा बढ़ता है और यह लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो RBI के पास FY27 में ब्याज दरों (Repo Rate) में 25 से 50 बेसिस प्वाइंट (0.25% - 0.50%) की बढ़ोतरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। इसका मतलब है कि आने वाले समय में लोन महंगे हो सकते हैं।
रुपये और लिक्विडिटी को संभालने की रणनीति
करेंसी मार्केट की बात करें तो डॉलर के मुकाबले रुपये को भारी उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए RBI पूरी तरह मुस्तैद है। RBI रेगुलेटरी सख्ती के जरिए (जैसे हाल ही में बैंकों की फॉरेक्स पोजिशनिंग के लिए किया गया) और अपने भारी-भरकम फॉरेक्स रिजर्व का इस्तेमाल करके बाजार में दखल देता रहेगा।
जब RBI बाजार में डॉलर बेचता है (फॉरेक्स ऑपरेशन्स), तो सिस्टम से रुपये की लिक्विडिटी (नगदी) कम हो जाती है। इस नगदी की कमी को पूरा करने और बॉन्ड मार्केट को सपोर्ट देने के लिए, RBI जरूरत के हिसाब से OMOs (ओपन मार्केट ऑपरेशन्स) या दूसरे लिक्विडिटी उपायों का सहारा लेना भी जारी रख सकता है।
कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया का संघर्ष सिर्फ उन दो या तीन देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल सप्लाई चेन के जरिए भारतीय बाजारों तक पहुंच चुका है। भले ही Q4FY26 में भारतीय कंपनियों ने खुद को बचा लिया हो, लेकिन अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो FY27 में कंपनियों के मार्जिन, कैपेक्स और आम आदमी की ईएमआई पर इसका सीधा असर दिखना तय है। निवेशकों और आम लोगों को अब RBI की अगली पॉलिसियों और कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर पैनी नजर रखनी होगी।

