ट्रंप का हंटर: विदेशी दवाओं पर 100% तक टैरिफ का ऐलान, फार्मा कंपनियों को ‘करो या मरो' की चेतावनी

MoneySutraHub Team

 Trump pharma tariffs: अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने फार्मा इंडस्ट्री में हड़कंप मचाने वाला एक बड़ा फैसला लिया है। उन्होंने एक नए कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत अमेरिका में आयात होने वाली कुछ पेटेंट दवाओं पर 100 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ (आयात शुल्क) लगाया जा सकता है। यह कड़ा कदम उन कंपनियों के खिलाफ उठाया जाएगा जो आने वाले महीनों में अमेरिकी सरकार के साथ दवाओं की कीमतों को लेकर समझौता नहीं करेंगी। ट्रंप प्रशासन का मुख्य उद्देश्य अमेरिका के भीतर दवाओं और उनके कच्चे माल (API) का उत्पादन बढ़ाना, स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करना और अमेरिकी नागरिकों के लिए महंगी दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करना है। बिना समझौते वाली कंपनियों पर शुरुआत में 20 प्रतिशत टैरिफ लगेगा, जो 4 साल में बढ़कर 100 प्रतिशत हो जाएगा। इस फैसले का ग्लोबल फार्मा सप्लाई चेन पर गहरा असर पड़ सकता है।


100 percent tariff on medicines



नई दिल्ली, 3 अप्रैलः अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने चिर-परिचित ‘अमेरिका फर्स्ट' (America First) के अंदाज में एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। गुरुवार को उन्होंने एक ऐसे कार्यकारी आदेश (Executive Order) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसने पूरी दुनिया की फार्मा इंडस्ट्री की नींद उड़ा दी है। इस नए आदेश के तहत, अमेरिका में आने वाली कुछ विदेशी पेटेंट दवाओं पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैरिफ लगाया जा सकता है।


सीधे शब्दों में कहें तो ट्रंप सरकार ने बड़ी दवा कंपनियों को एक साफ अल्टीमेटम दे दिया है  "या तो हमारी शर्तों पर समझौता करो और अमेरिका में उत्पादन शुरू करो, या फिर भारी टैक्स चुकाने के लिए तैयार रहो।" यह फैसला न सिर्फ अमेरिका के घरेलू बाजार के लिए अहम है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की दवा सप्लाई चेन पर पड़ने वाला है। आइए इस फैसले को विस्तार से समझते हैं।


क्या है यह नया टैरिफ नियम और किसे मिलेगी छूट?


ट्रंप सरकार का यह नया नियम हर कंपनी के लिए अलग-अलग शर्तें लेकर आया है। सरकार ने इसे इस तरह से डिजाइन किया है कि कंपनियां मजबूर होकर अमेरिका में ही निवेश करें। इस नियम को मुख्य रूप से 3 हिस्सों में बांटा जा सकता है:


0 प्रतिशत टैरिफ (पूरी छूट): जिन फार्मा कंपनियों ने अमेरिकी सरकार के साथ "मोस्ट फेवर्ड नेशन" (Most Favored Nation) प्राइसिंग डील कर ली है और जो अमेरिका की धरती पर पेटेंट दवाओं और उनके कच्चे माल (Raw Material) को बनाने के लिए नई फैक्ट्री लगा रही हैं, उन्हें कोई टैक्स नहीं देना होगा।


20 प्रतिशत टैरिफ (चेतावनी का स्तर): ऐसी कंपनियां जिन्होंने सरकार के साथ कोई प्राइसिंग डील (कीमत समझौता) तो नहीं की है, लेकिन वे अमेरिका में अपनी दवाओं का उत्पादन शुरू कर रही हैं, उन पर फिलहाल 20 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा।


100 प्रतिशत टैरिफ (सख्त सजा): अगर ऊपर बताई गई 20 प्रतिशत टैरिफ वाली कंपनियां अगले 4 साल के भीतर सरकार के साथ कोई समझौता नहीं करती हैं, तो यह टैक्स धीरे-धीरे बढ़कर 100 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा।


कंपनियों के पास कितना समय है? 


सरकार रातों-रात यह टैक्स नहीं थोप रही है, बल्कि कंपनियों को बातचीत करने के लिए एक मोहलत दी गई है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने जानकारी दी है कि कंपनियों के पास टेबल पर बैठकर बात करने का समय अभी बाकी है।


बड़ी फार्मा कंपनियों के लिए: 120 दिन का समय।


अन्य छोटी-मझोली कंपनियों के लिए: 180 दिन का समय। अगर इस तय समयसीमा के अंदर कंपनियां सरकार की शर्तें नहीं मानती हैं, तो उन पर 100 प्रतिशत टैरिफ का चाबुक चल सकता है। अधिकारी ने हालांकि यह साफ नहीं किया कि किन खास दवाओं या कंपनियों पर यह नियम सबसे पहले लागू होगा, लेकिन उन्होंने यह जरूर बताया कि सरकार पहले ही बड़ी दवा कंपनियों के साथ 17 कीमत समझौतों पर बात कर चुकी है, जिनमें से 13 पर हस्ताक्षर भी हो चुके हैं।


राष्ट्रीय सुरक्षा का दिया गया हवाला


ट्रंप ने अपने इस कार्यकारी आदेश को सिर्फ एक आर्थिक कदम नहीं, बल्कि "राष्ट्रीय सुरक्षा" से जुड़ा मुद्दा बताया है। उनका मानना है कि जीवन रक्षक दवाओं और उन्हें बनाने वाले कच्चे माल के लिए दूसरे देशों (विदेशी आयात) पर निर्भर रहना अमेरिका की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। किसी भी महामारी या युद्ध की स्थिति में अगर सप्लाई चेन टूटती है, तो अमेरिकी नागरिकों की जान खतरे में पड़ सकती है।


दिलचस्प बात यह है कि यह आदेश ट्रंप के तथाकथित "लिबरेशन डे" (Liberation Day) की पहली सालगिरह के मौके पर आया है। ठीक एक साल पहले इसी दिन उन्होंने दुनिया के लगभग हर देश से आने वाले उत्पादों पर भारी आयात शुल्क लगाने की घोषणा की थी, जिससे ग्लोबल शेयर बाजार बुरी तरह क्रैश हो गए थे। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में उन पुराने टैरिफ में से कुछ को रद्द कर दिया था।


फार्मा इंडस्ट्री में मचा हड़कंप, जताई चिंता


ट्रंप के इस मास्टरस्ट्रोक से दवा बनाने वाली कंपनियों में खलबली मच गई है। दवा उद्योग के सबसे बड़े संगठनों में से एक 'PhRMA' के सीईओ (CEO) स्टीफन जे. उबल ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की है।


उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, "अत्याधुनिक और जीवन रक्षक दवाओं पर इस तरह का टैक्स लगाने से अंततः लागत ही बढ़ेगी। इसका सीधा असर अमेरिका में होने वाले अरबों डॉलर के निवेश पर पड़ सकता है।" उन्होंने सरकार को याद दिलाया कि अमेरिका में पहले से ही बायोफार्मा मैन्युफैक्चरिंग का एक बहुत बड़ा और मजबूत आधार मौजूद है। साथ ही, जो दवाएं बाहर से आती भी हैं, वे ज्यादातर अमेरिका के भरोसेमंद और सहयोगी देशों से ही आती हैं।


विदेशी कंपनियों को झुकाने का ट्रंप का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड


डॉनल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही कड़े तेवर अपनाए हुए हैं। उन्होंने कई देशों पर आयात शुल्क लगाए हैं और विदेशी दवाओं पर भारी टैरिफ की धमकी बार-बार दी है।


लेकिन जानकारों का मानना है कि ट्रंप की यह धमकी असल में एक 'नेगोशिएशन टूल' (बातचीत का हथियार) है। उनकी सरकार ने इसी टैरिफ की धमकी का डर दिखाकर Pfizer, Eli Lilly और Bristol Myers Squibb जैसी दुनिया की सबसे बड़ी फार्मा कंपनियों के साथ सफलतापूर्वक समझौते किए हैं। इन कंपनियों ने डर के मारे अमेरिका में अपनी नई दवाओं की कीमतें कम करने का वादा किया है।


दुनिया के बाकी देशों पर क्या होगा असर?


कंपनियों पर लगने वाले टैक्स के अलावा, अमेरिका ने कुछ देशों के साथ अलग से व्यापार समझौते भी किए हैं। इसका ग्लोबल मार्केट पर सीधा असर पड़ेगा:


15 प्रतिशत टैरिफ: यूरोपीय संघ (EU), जापान, कोरिया और स्विट्जरलैंड से आने वाली पेटेंट दवाओं पर अब 15 प्रतिशत टैरिफ लगेगा। यह दर अन्य उत्पादों के लिए तय की गई दरों के ही समान है।


10 प्रतिशत टैरिफ (ब्रिटेन के लिए): ब्रिटेन से आने वाली दवाओं पर फिलहाल 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा। हालांकि, अमेरिका ने यह विकल्प खुला रखा है कि भविष्य में व्यापार समझौतों के तहत इसे घटाकर शून्य (0 प्रतिशत) किया जा सकता है।


ब्रिटेन की तरफ से पहले ही यह बयान आ चुका है कि उन्हें कम से कम अगले 3 वर्षों के लिए अमेरिका को निर्यात होने वाली दवाओं पर जीरो प्रतिशत टैरिफ की छूट मिली हुई है।


इस पॉलिसी के मुख्य उद्देश्य क्या हैं?


ट्रंप सरकार के इस सख्त फैसले के पीछे तीन सबसे बड़े लक्ष्य छिपे हैं:


मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना: दवा कंपनियों को मजबूर करना कि वे अपनी फैक्ट्रियां अमेरिका में लगाएं, ताकि वहां रोजगार पैदा हो।


दवाओं की कीमत पर लगाम: अमेरिकी नागरिकों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराना और कंपनियों की मनमानी रोकना।


आयात पर निर्भरता खत्म करना: चीन और अन्य देशों से कच्चे माल और दवाओं के आयात पर निर्भरता कम करके अमेरिका को मेडिकल क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना।

 

डॉनल्ड ट्रंप का यह नया आदेश स्पष्ट करता है कि वह अमेरिकी व्यापार और अर्थव्यवस्था को लेकर किसी भी विदेशी दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं। जहां एक तरफ सरकार इसे देश हित और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बता रही है, वहीं फार्मा इंडस्ट्री को डर है कि इस जिद के कारण ग्लोबल सप्लाई चेन टूट सकती है और अंततः आम मरीज को नुकसान हो सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या 120 और 180 दिनों की दी गई डेडलाइन के अंदर बड़ी विदेशी कंपनियां ट्रंप की शर्तों के आगे घुटने टेकती हैं, या फिर मेडिकल क्षेत्र में एक नए ग्लोबल ट्रेड वॉर की शुरुआत होती है।


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