Explainer: पेट्रोलियम को क्यों कहा जाता है ‘ब्लैक गोल्ड'? जानिए इसके प्रकार, उपयोग और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर

MoneySutraHub Team

 Petroleum Products in India: क्या आप जानते हैं कि विदेशों से आयात होने वाला क्रूड ऑयल सिर्फ आपकी गाड़ी के फ्यूल टैंक तक सीमित नहीं है? सुबह की चाय बनाने वाले LPG गैस से लेकर हवाई जहाज के ईंधन, सड़कों पर बिछने वाले डामर और आपके हाथ में मौजूद प्लास्टिक तक, सब कुछ इसी 'ब्लैक गोल्ड' (काले सोने) से बनता है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है। इस विस्तृत लेख में हम समझेंगे कि कच्चे तेल को रिफाइन कैसे किया जाता है, भारत में कितने प्रकार के पेट्रोलियम उत्पादों का इस्तेमाल होता है, और हमारी अर्थव्यवस्था डीजल-पेट्रोल पर कितनी निर्भर है। साथ ही जानेंगे कि 88% आयात पर निर्भर भारत कैसे एथेनॉल ब्लेंडिंग और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के जरिए अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर रहा है।

Petroleum Products in India


नई दिल्ली, 17 मार्चः आधुनिक मानव सभ्यता की कल्पना बिना ऊर्जा के नहीं की जा सकती। जब हम 'कच्चे तेल' या क्रूड ऑयल के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले पेट्रोल पंप और गाड़ियां आती हैं। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक और हैरान करने वाली है। सुबह उठकर जिस गैस स्टोव पर आप चाय बनाते हैं, जिस पक्की सड़क पर आप सफर करते हैं, आसमान में उड़ने वाले विमान और यहां तक कि रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाला प्लास्टिक भी ये सब उसी गाढ़े, गहरे रंग के तरल पदार्थ की देन हैं जिसे हम ‘ब्लैक गोल्ड' या 'काला सोना' कहते हैं।


भारत वर्तमान में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा और तेल उपभोक्ता देश है। हमारी बढ़ती आबादी और तेजी से भागती अर्थव्यवस्था के लिए यह 'काला सोना' किसी संजीवनी से कम नहीं है। लेकिन यह क्रूड ऑयल सीधे जमीन या समुद्र से निकालकर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसे हमारे उपयोग लायक कैसे बनाया जाता है? इसके कितने रूप हैं और भारत की अर्थव्यवस्था में इनकी क्या भूमिका है? आइए इस विस्तृत विश्लेषण में हर पहलू को गहराई से समझते हैं।


पेट्रोलियम उत्पादों का वर्गीकरण और रिफाइनिंग की प्रक्रिया  


जमीन के अंदर या समुद्र की गहराइयों से निकाला गया कच्चा तेल (Crude Oil) अशुद्धियों से भरा होता है। यह सीधे तौर पर किसी इंजन या मशीन में नहीं डाला जा सकता। इसे उपयोगी बनाने के लिए विशाल रिफाइनरियों में भेजा जाता है, जहां 'फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन' (Fractional Distillation) नामक एक जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाई जाती है।


इस प्रक्रिया में कच्चे तेल को बेहद ऊंचे तापमान पर गर्म किया जाता है। तेल में मौजूद अलग-अलग घटकों का 'उबलने का बिंदु' (Boiling Point) अलग-अलग होता है। जैसे-जैसे तेल गर्म होता है, सबसे हल्के तत्व गैस के रूप में सबसे ऊपर आ जाते हैं, जिसे हम LPG के रूप में जानते हैं। वहीं, सबसे भारी और गाढ़ा हिस्सा नीचे बैठ जाता है, जिसे बिटुमेन (डामर) कहा जाता है। इस एक प्रक्रिया से भारत में एक दर्जन से अधिक विभिन्न पेट्रोलियम उत्पाद तैयार किए जाते हैं।


वर्तमान आंकड़ों की बात करें तो भारत की कुल ऑयल रिफाइनिंग क्षमता 25.8 करोड़ टन प्रति वर्ष है, जो देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए लगातार काम कर रही है।


डीजल: भारतीय अर्थव्यवस्था का असली इंजन


जब हम भारत की बात करते हैं, तो हाई स्पीड डीजल (HSD) देश की अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ है। यह भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला पेट्रोलियम उत्पाद है, जिसकी कुल खपत में हिस्सेदारी 35% से भी अधिक है।


खपत का अनुमान: वर्ष 2025-26 में डीजल की खपत लगभग 9.1 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो 2026-27 तक बढ़कर 9.6 करोड़ टन हो सकती है।


लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट: देश में चलने वाले लाखों ट्रक, बसें और मालवाहक वाहन पूरी तरह डीजल पर निर्भर हैं। भारतीय रेलवे के हजारों इंजन भी डीजल से ही दौड़ते हैं।


कृषि क्षेत्र: भारतीय कृषि में डीजल का कोई सीधा विकल्प अभी तक नहीं है। खेतों में चलने वाले ट्रैक्टर, फसल काटने वाली मशीनें और सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले पंप सेट डीजल से ही चलते हैं।


औद्योगिक उपयोग: कारखानों और मॉल्स में बिजली जाने की स्थिति में बड़े जनरेटर चलाने के लिए भी डीजल ही काम आता है।


विश्लेषण: यही कारण है कि जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं और देश में डीजल महंगा होता है, तो माल ढुलाई का किराया बढ़ जाता है। इसका सीधा असर रोजमर्रा की चीजों जैसे सब्जी, फल और अनाज के दामों पर पड़ता है, जिससे महंगाई (Inflation) तेजी से बढ़ती है।


पेट्रोल: तेजी से बदलता कंज्यूमर ट्रेंड



तकनीकी भाषा में 'मोटर स्पिरिट' कहे जाने वाले पेट्रोल का इस्तेमाल भारत में दूसरे सबसे बड़े ईंधन के रूप में होता है। पिछले दो दशकों में पेट्रोल की खपत में चमत्कारिक वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2001 में कुल पेट्रोलियम खपत में पेट्रोल की हिस्सेदारी मात्र 7% थी, जो आज बढ़कर लगभग 18% हो चुकी है।


खपत का आंकड़ा: वर्ष 2025-26 में 4 करोड़ टन पेट्रोल की खपत का अनुमान है, जो 2026-27 में 4.5 करोड़ टन तक पहुंच सकती है।


क्यों बढ़ रही है पेट्रोल की मांग?


देश में मिडिल क्लास की आय बढ़ने से टू-व्हीलर और कारों की संख्या में भारी उछाल आया है।

वाहन निर्माता कंपनियों ने पेट्रोल इंजनों की माइलेज और कार्यक्षमता में जबरदस्त सुधार किया है।

एक समय था जब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बड़ा अंतर होता था (पेट्रोल-टू-डीजल रेशियो 1:7 था), लेकिन अब यह अंतर घटकर मात्र 7 से 10 रुपये प्रति लीटर रह गया है। इस कारण लोग अब डीजल कारों के बजाय पेट्रोल कारों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। अब यह रेशियो घटकर 1:2.3 पर आ गया है।


LPG: हर भारतीय रसोई की जीवनरेखा



लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) ने भारतीय रसोई को धुएं से मुक्ति दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। भारत सरकार की 'उज्ज्वला योजना' जैसी शानदार पहलों ने दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में भी LPG सिलेंडर पहुंचा दिए हैं।


वर्ष 2001 में देश की कुल ऊर्जा खपत में LPG का हिस्सा 7.7% था, जो अब बढ़कर 13.7% हो गया है।


अनुमान है कि 2025-26 में इसकी खपत 3.1 करोड़ टन और 2026-27 में 3.4 करोड़ टन होगी।


आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2026 तक इसके उपयोग में 10.16% की वृद्धि का अनुमान जताया गया है।


प्रोपेन और ब्यूटेन के मिश्रण से बनने वाली यह गैस अब ‘ऑटो-LPG' के रूप में थ्री-व्हीलर और कारों में भी इस्तेमाल हो रही है।


एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF): आसमान छूती उड़ानें


एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) एक बेहद शुद्ध और उच्च गुणवत्ता वाला ईंधन है जो हवाई जहाजों में इस्तेमाल होता है। भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाजार बन चुका है। व्यापार और पर्यटन बढ़ने से हवाई सफर करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है।


अनुमानित खपत: 2025-26 में 83.5 लाख टन और 2026-27 में 97 लाख टन। आने वाले समय (फरवरी 2026 तक) में इसकी मांग में 3.33% का इजाफा देखा जा सकता है।


नेफ्था (Naphtha): पेट्रोकेमिकल और प्लास्टिक का आधार



नेफ्था एक हल्का तरल पदार्थ है जिसका उपयोग सीधे ईंधन के रूप में कम, लेकिन पेट्रोकेमिकल उद्योगों में कच्चे माल के रूप में बहुत ज्यादा होता है। आपके इस्तेमाल करने वाले प्लास्टिक के डिब्बे, यूरिया जैसे फर्टिलाइजर और कृत्रिम कपड़े (सिंथेटिक फैब्रिक) नेफ्था से ही बनते हैं। इसकी मांग 8.3% की दर से बढ़ रही है और 2026-27 तक यह 1.27 करोड़ टन तक पहुंच सकती है।


बुनियादी ढांचे का निर्माता: बिटुमेन (Bitumen) और पेटकोक


बिटुमेन (डामर): रिफाइनिंग प्रक्रिया के अंत में जो गाढ़ा, काला पदार्थ बचता है उसे बिटुमेन कहते हैं। भारत में एक्सप्रेसवे और नेशनल हाईवे का जाल तेजी से बिछ रहा है। हर नई सड़क के निर्माण में इसी डामर का प्रयोग होता है। भारत में इसका सालाना उपयोग लगभग 78 लाख टन है।


पेट्रोलियम कोक (Petcoke): यह कोयले का एक बेहतरीन विकल्प है। दो दशक पहले इसकी हिस्सेदारी 0.5% से भी कम थी, लेकिन आज सीमेंट फैक्ट्रियों और पावर प्लांट्स में इसका उपयोग 9% तक पहुंच गया है। यह देश का चौथा सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला पेट्रोलियम उत्पाद है।


लुब्रिकेंट्स और केरोसिन की बदलती स्थिति


लुब्रिकेंट्स (Lubricants): मशीनों को घर्षण से बचाने और सुचारू रूप से चलाने के लिए भारत में हर साल करीब 45 लाख टन लुब्रिकेंट्स और ग्रीस का उपयोग होता है।


केरोसिन (मिट्टी का तेल): भारत के ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) की सबसे बड़ी सफलता केरोसिन के इस्तेमाल में आई गिरावट है। 2001 में इसका हिस्सा 11% था, जो आज घटकर मात्र 0.2% रह गया है। 100% ग्रामीण विद्युतीकरण और LPG की पहुंच ने मिट्टी के तेल को लगभग इतिहास बना दिया है।


इसके अलावा, फर्नेस ऑयल (2.6%), लॉ सल्फर हेवी स्टॉक (LSHS) और विभिन्न सॉल्वैंट्स का उपयोग भी उद्योगों में भारी मात्रा में होता है।


भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आयात की चुनौतियां 


भारत एक विशाल देश है, लेकिन हमारे पास कच्चे तेल के प्राकृतिक भंडार बेहद सीमित हैं (जैसे राजस्थान, गुजरात और मुंबई हाई)। अपनी कुल जरूरत का 88% से ज्यादा क्रूड ऑयल भारत विदेशों से आयात करता है। देश में हर दिन लगभग 55 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत होती है।


अपनी ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने के लिए भारत सरकार ने कई कूटनीतिक और रणनीतिक कदम उठाए हैं: 


भारत अब दुनिया के 40 से अधिक देशों से क्रूड ऑयल खरीदता है ताकि किसी एक देश पर निर्भरता न रहे।


2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने सस्ती दरों पर रूसी तेल का आयात बढ़ाया है। कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 20% तक पहुंच गई है।


रणनीतिक तौर पर, भारत अपना 70% कच्चा तेल अब 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) के अलावा अन्य सुरक्षित समुद्री मार्गों से मंगा रहा है, ताकि मध्य पूर्व में तनाव का असर हमारी सप्लाई पर न पड़े।

LPG की निरंतर सप्लाई के लिए अमेरिका के साथ 22 लाख टन प्रति वर्ष आयात का बड़ा करार किया गया है।


हरित ऊर्जा की ओर भारत के कदम  


पेट्रोलियम उत्पादों पर भारी निर्भरता विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालती है। इसे कम करने के लिए भारत सरकार वैकल्पिक ऊर्जा पर तेजी से काम कर रही है:


एथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending): 2014 में पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट सिर्फ 1.5% थी, जिसे 2025 तक 20% करने का लक्ष्य हासिल किया जा रहा है। इससे हर साल लगभग 4.4 करोड़ बैरल क्रूड ऑयल की बचत हो रही है। 2014 से अब तक भारत 19 करोड़ बैरल कच्चे तेल के आयात का खर्च बचा चुका है।


इलेक्ट्रिक वाहन (EVs): भारत की सड़कों पर EV क्रांति आ चुकी है। 2019-20 की तुलना में 2023-24 में EV के रजिस्ट्रेशन में 9.7 गुना की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। 2025-26 तक 23 लाख EV की बिक्री का अनुमान है।


मल्टी-फ्यूल अप्रोच: सीएनजी (CNG), लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG), ग्रीन हाइड्रोजन और बायोफ्यूल्स को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया जा रहा है।


भविष्य की संभावनाएं: ग्लोबल ऑयल मार्केट का नया लीडर


अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले 10 वर्षों में भारत वैश्विक तेल मांग का सबसे बड़ा संचालक (Driver) बन जाएगा और चीन को भी पीछे छोड़ देगा।


वर्ष 2035 तक भारत में तेल की खपत 55 लाख बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 80 लाख बैरल प्रतिदिन होने का अनुमान है। इस मांग को पूरा करने के लिए भारत में वर्तमान में 23 रिफाइनरियां काम कर रही हैं, जिनकी कुल क्षमता 26 करोड़ टन सालाना है। सरकार का लक्ष्य जल्द ही इस रिफाइनिंग क्षमता को बढ़ाकर 30 करोड़ टन प्रति वर्ष करने का है।


‘ब्लैक गोल्ड' यानी पेट्रोलियम उत्पाद सिर्फ ईंधन नहीं हैं, बल्कि यह भारत के विकास की गति तय करने वाला सबसे अहम कारक है। एक तरफ जहां पेट्रोल, डीजल और नेफ्था हमारी बढ़ती अर्थव्यवस्था की भूख मिटा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत सरकार एथेनॉल ब्लेंडिंग और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के जरिए भविष्य की टिकाऊ ऊर्जा की नींव भी रख रही है। एक विकासशील देश से विकसित राष्ट्र बनने के सफर में कच्चे तेल और क्लीन एनर्जी के बीच का यह संतुलन ही भारत की असली जीत तय करेगा।


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