Crude Oil Price, Hormuz Crisis: ईरान ने ट्रंप के बातचीत के दावे को झूठा बताया, जिससे कच्चे तेल में फिर आग लग गई है। जानें होर्मुज संकट के बीच कैसे ब्रेंट क्रूड $150 तक पहुंच सकता है और भारत पर क्या होगा इसका असर।
नई दिल्ली, 24 मार्च: वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए मंगलवार का दिन भारी उथल-पुथल लेकर आया। सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में आई 10% की बड़ी गिरावट के बाद आज बाजार में फिर से आग लग गई। इस आग को हवा दी ईरान के उस तीखे बयान ने, जिसमें उसने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें 'सफल बातचीत' और 'हमले टालने' की बात कही गई थी। ईरान के इस पलटवार ने तेल बाजार में अनिश्चितता का माहौल और गहरा दिया है, और अब विशेषज्ञ ये आशंका जता रहे हैं कि यह संकट लंबा खिंचा तो ब्रेंट क्रूड $150 प्रति बैरल के ऐतिहासिक स्तर को भी छू सकता है।
बयानबाजी का खेल और बाजार में भूचाल
सोमवार को बाजार में तब राहत की सांस ली गई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि ईरान के साथ उनकी 'सकारात्मक बातचीत' हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि अगले 5 दिनों के लिए ईरान पर होने वाले हमलों को टाल दिया गया है। इस खबर का असर तुरंत हुआ और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 10% तक लुढ़क गईं। दुनिया भर के बाजारों ने इसे तनाव कम होने का संकेत माना।
लेकिन यह शांति 24 घंटे भी नहीं टिक सकी। मंगलवार सुबह ईरान ने ट्रंप के दावों को "सफेद झूठ" और "घिसा-पिटा मनोवैज्ञानिक युद्ध" करार दिया। तेहरान ने साफ कहा कि अमेरिका वित्तीय बाजारों को अपने फायदे के लिए मैनिपुलेट करने की कोशिश कर रहा है और ऐसी कोई बातचीत नहीं हुई है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने न केवल बातचीत की खबरों का खंडन किया, बल्कि अमेरिकी ठिकानों पर नए हमलों का दावा भी कर दिया। इस बयान के आते ही बाजार का सेंटिमेंट पूरी तरह पलट गया:
ब्रेंट क्रूड: $1.06 की तेजी (1.1%) के साथ $101 प्रति बैरल पर पहुंच गया। WTI क्रूड: $1.58 की उछाल (1.8%) के साथ $89.71 प्रति बैरल पर कारोबार करने लगा। यह घटनाक्रम दिखाता है कि बाजार इस वक्त कितना संवेदनशील है और होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट कितना गहरा है।
क्यों मचा है होर्मुज पर बवाल? यह रास्ता इतना ज़रूरी क्यों है?
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और खुले समुद्र से जोड़ने वाला एक संकरा समुद्री रास्ता है। यह दुनिया के लिए किसी ‘लाइफलाइन' से कम नहीं है, खासकर तेल के व्यापार के लिए।
वैश्विक तेल व्यापार का केंद्र: दुनिया का लगभग 20-30% तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत और यूएई जैसे बड़े तेल उत्पादक देश अपने तेल टैंकर इसी रास्ते से दुनिया भर में भेजते हैं।
भारत के लिए अहम: भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है, और हमारे ज्यादातर जहाज भी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं।
संकट का मतलब: इस रास्ते का बंद होना या यहाँ किसी भी तरह का सैन्य संघर्ष होने का सीधा मतलब है कि दुनिया की तेल सप्लाई चेन का एक बड़ा हिस्सा ठप हो जाना। जब सप्लाई घटती है और मांग उतनी ही रहती है, तो कीमतें आसमान छूने लगती हैं। यही डर आज बाजार पर हावी है।
बाजार विश्लेषकों का साफ मानना है कि जब तक होर्मुज का यह रास्ता पूरी तरह से सुरक्षित और खुला नहीं हो जाता, तब तक तेल की कीमतों में यह खतरनाक उतार-चढ़ाव जारी रहेगा। ईरान में 'इस्फहान' के एक गैस स्टेशन और 'खुर्रमशहर' के पावर स्टेशन को जोड़ने वाली पाइपलाइन पर हुए ताजा हमले इस तनाव को और बढ़ा रहे हैं।
$150 प्रति बैरल - क्या ये डरावनी भविष्यवाणी सच होगी?
दुनिया की जानी-मानी वित्तीय संस्था मैक्वेरी (Macquarie) ने इस संकट को लेकर एक गंभीर चेतावनी जारी की है। मैक्वेरी के एनालिस्ट्स का मानना है कि यह तो बस शुरुआत है।
न्यूनतम स्तर: जब तक संकट जारी है, तेल की कीमतें $85-$90 प्रति बैरल के नीचे नहीं जाएंगी। यह एक 'फ्लोर प्राइस' बन गया है।
तत्काल उछाल: बहुत जल्द कीमतें वापस $110 की रेंज में जा सकती हैं।
ऐतिहासिक महंगाई का खतरा: मैक्वेरी की सबसे डरावनी भविष्यवाणी यह है कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है और अप्रैल के अंत तक होर्मुज जलडमरूमध्य प्रभावी रूप से बंद रहता है, तो ब्रेंट क्रूड का भाव $150 प्रति बैरल के रिकॉर्ड स्तर को छू सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो यह 2008 के वित्तीय संकट के समय की कीमतों को भी पार कर जाएगा और दुनिया भर में महंगाई का भूचाल ला देगा।
भारत के लिए क्या हैं राहत और चुनौतियाँ?
भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी 85% से ज्यादा तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, यह संकट एक बड़ी चुनौती है। कीमतें बढ़ने का सीधा असर हमारे पेट्रोल-डीजल के दामों, माल ढुलाई की लागत और आखिरकार हर घर के बजट पर पड़ता है। लेकिन इस संकट के बीच भारत के लिए कुछ उम्मीद की किरणें भी हैं।
राहत की खबर: सोमवार को भारत के दो एलपीजी (LPG) टैंकर सुरक्षित रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को पार कर गए। इससे घरेलू रसोई गैस की किल्लत को लेकर बनी चिंता थोड़ी कम हुई है।
व्यापार का नया रास्ता: अमेरिका ने अस्थायी रूप से समुद्र में मौजूद ईरानी और रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी है। इसका फायदा उठाते हुए ट्रेडर्स ने भारतीय रिफाइनरियों को प्रीमियम कीमत पर ईरानी कच्चा तेल खरीदने की पेशकश की है। यह भारत को सप्लाई का एक और विकल्प देता है।
रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Reserve): अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के प्रमुख फातिह बिरोल ने संकेत दिया है कि अगर हालात ज्यादा बिगड़ते हैं तो सदस्य देश मिलकर अपने रणनीतिक तेल भंडारों को बाजार में उतार सकते हैं। भारत के पास भी अपना रणनीतिक रिजर्व है, जिसका इस्तेमाल आपात स्थिति में कीमतों को नियंत्रित करने के लिए किया जा सकता है।
फिलहाल, कच्चे तेल का बाजार एक 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में है। एक तरफ ट्रंप के बयान हैं, तो दूसरी तरफ ईरान का आक्रामक रुख। यह शब्दों की जंग कब मैदान की जंग में बदल जाए, कोई नहीं जानता। जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य में शांति और सुरक्षा बहाल नहीं होती, तब तक दुनिया की अर्थव्यवस्था पर अनिश्चितता के बादल मंडराते रहेंगे।
भारत सरकार कूटनीतिक और व्यापारिक, दोनों स्तरों पर स्थिति को संभालने की कोशिश कर रही है, लेकिन अगर कीमतें $150 के स्तर तक पहुंचती हैं, तो यह न केवल सरकार के लिए, बल्कि हर आम भारतीय के लिए एक बड़ी आर्थिक चुनौती होगी।

