Rupee Record Low: युद्ध और महंगाई की मार, डॉलर के मुकाबले औंधे मुंह गिरा रुपया, 93.83 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर

MoneySutraHub Team

 Rupee Record Low: सोमवार, 23 मार्च को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले औंधे मुंह गिरकर 93.83 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। यह गिरावट पिछले शुक्रवार को चार साल में हुई सबसे बड़ी एक-दिवसीय गिरावट के बाद आई है। बाजार पर पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध, ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों ($110 प्रति बैरल) का भारी दबाव है। विदेशी निवेशकों (FII) ने 2026 में अब तक भारतीय इक्विटी से $9 बिलियन से ज्यादा की भारी बिकवाली की है। करेंसी ट्रेडर्स अब रुपये को संभालने के लिए रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) के किसी भी बड़े कदम का इंतज़ार कर रहे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक ग्लोबल मार्केट में जिओ-पॉलिटिकल तनाव कम नहीं होता, तब तक रुपये पर यह दबाव लगातार बना रह सकता है और 94.00 का लेवल एक बड़ी चुनौती होगा।


Rupee vs Dollar

नई दिल्ली, 23 मार्चः वैश्विक स्तर पर छाई अनिश्चितता, महंगाई और युद्ध के मंडराते बादलों के बीच भारतीय करेंसी को करारा झटका लगा है। सोमवार, 23 मार्च को अमेरिकी डॉलर के सामने भारतीय रुपया पूरी तरह से बेबस नजर आया और 93.83 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर खुलते ही धड़ाम हो गया।


यह कोई एक दिन की बात नहीं है। पिछले कुछ दिनों से करेंसी मार्केट में कोहराम मचा हुआ है। शुक्रवार को भी रुपये ने पिछले चार सालों में एक दिन की अपनी सबसे बड़ी गिरावट का सामना किया था। अब सवाल यह उठता है कि आखिर हमारी लोकल करेंसी इतनी तेजी से क्यों गिर रही है और इसे बचाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? आइए इस पूरी खबर को आसान भाषा में समझते हैं।


लगातार टूटता रुपया और बाजार का हाल


अगर हम आंकड़ों पर नज़र डालें, तो लोकल करेंसी डॉलर के मुकाबले 93.84 रुपये पर ट्रेड कर रही थी। इससे ठीक पिछले ट्रेडिंग सेशन की बात करें, तो यह 93.71 रुपये प्रति डॉलर के लेवल पर थी। सबसे बड़ा झटका तो 20 मार्च को लगा था, जब रुपये में लगभग 100 पैसे की भारी गिरावट दर्ज की गई। मार्केट के जानकारों के मुताबिक, यह पिछले चार साल में रुपये के भीतर सबसे बड़ी इंट्रा-डे (एक ही दिन में) गिरावट थी।


हालात सिर्फ घरेलू बाजार में ही खराब नहीं हैं। ऑफशोर मार्केट (विदेशी बाजार) में रुपया पहले ही अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94 के खतरनाक लेवल के नीचे खिसक चुका था। यह इस बात का साफ इशारा था कि भारतीय करेंसी पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। वहीं, नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDF) मार्केट के रेट्स भी सुबह-सुबह इसी बात की गवाही दे रहे थे कि आज करेंसी डॉलर के मुकाबले 93.78 से लेकर 93.82 की रेंज में ही खुलेगी।


रुपये के गिरने के 3 सबसे बड़े कारण


रुपये में आई इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे कोई एक वजह नहीं है, बल्कि दुनिया भर में चल रहे कई बड़े बवाल इसके लिए जिम्मेदार हैं।




1. पश्चिम एशिया में भड़कता युद्ध और अमेरिका-ईरान तनाव


दुनिया के एक हिस्से में लगातार बम बरस रहे हैं और इसका सीधा असर हमारे रुपये पर पड़ रहा है। पश्चिम एशिया (West Asia) में युद्ध अब अपने तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है और हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ते जा रहे हैं। मामला तब और गरमा गया जब अमेरिका और ईरान के बीच धमकियों का दौर शुरू हुआ। ईरान ने साफ तौर पर चेतावनी दी है कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 48 घंटे के भीतर ईरान के बिजली ग्रिड को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, तो वे चुप नहीं बैठेंगे। ईरान ने धमकी दी है कि इसके जवाब में वह अपने खाड़ी देशों (Gulf neighbors) के एनर्जी और पानी के सिस्टम पर बड़ा हमला कर देगा। इस भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव ने दुनिया भर के निवेशकों को डरा दिया है, जिससे वे अपना पैसा डॉलर जैसी सुरक्षित जगह पर लगा रहे हैं।


2. कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में लगी आग


युद्ध की इन धमकियों का सीधा असर कच्चे तेल के बाजार पर पड़ा है। ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें बेहद ऊंचे लेवल पर बनी हुई हैं। ब्रेंट क्रूड ऑयल $110 प्रति बैरल के खतरनाक लेवल पर ट्रेड कर रहा है, जबकि अमेरिकी क्रूड भी $100 प्रति बैरल के बिल्कुल करीब पहुंच चुका है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो भारत को इसके लिए ज्यादा डॉलर चुकाने पड़ते हैं। डॉलर की मांग बढ़ने और रुपये की सप्लाई बढ़ने से हमारी करेंसी अपने आप कमजोर हो जाती है।


3. विदेशी निवेशकों (FII) का बाजार से भागना


शेयर बाजार का सीधा कनेक्शन करेंसी से होता है। साल 2026 की शुरुआत से ही विदेशी निवेशकों (Global Funds) ने भारतीय बाजार से अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया है। आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय इक्विटी बाजार में 2026 में अब तक $9 बिलियन का भारी बिकवाली का दबाव देखा गया है। आपको बता दें कि यह रकम पिछले पूरे साल में बेचे गए $19 बिलियन का लगभग 50% है। सिर्फ शेयर ही नहीं, इंडेक्स-एलिजिबल बॉन्ड्स में भी मार्च के महीने में लगभग $1.4 बिलियन की बिकवाली की गई है। इस अंधाधुंध बिकवाली के कारण इस महीने रिकॉर्ड आउटफ्लो (पैसा बाहर जाना) होने की पूरी उम्मीद है। जब विदेशी निवेशक अपना पैसा डॉलर में बदलकर वापस ले जाते हैं, तो रुपया और टूट जाता है।


क्या रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) करेगा कोई मदद?


गिरते रुपये को देखकर अब सभी ट्रेडर्स और आम निवेशकों की नज़रें रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) पर टिकी हैं। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि RBI करेंसी को सहारा देने के लिए कोई बड़ा एक्शन लेगा। ब्लूमबर्ग न्यूज़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, RBI की नेट-शॉर्ट डॉलर बुक ऑफशोर और ऑनशोर मार्केट में $100 बिलियन के करीब पहुंच चुकी है। (नेट-शॉर्ट डॉलर बुक इस बात का पैमाना है कि RBI ने अपने फॉरेक्स स्टॉक को फॉरवर्ड मार्केट में कितना बेचा है)।


हालांकि, एक्सपर्ट्स को RBI से बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं। पिछले हफ्ते ही CNBC-TV18 से बातचीत के दौरान, DSP फाइनेंस के जयेश मेहता ने एक बड़ी बात कही थी। उन्होंने साफ किया कि RBI की तरफ से किसी बड़े मैनेजर के जरिए बाजार में सीधा दखल देने और करेंसी की इस गिरावट को मैनेज करने की उम्मीद बहुत कम नजर आ रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर भारतीय इक्विटी मार्केट से FII (विदेशी संस्थागत निवेशक) का पैसा बाहर जाना ऐसे ही जारी रहा, तो रुपये में डेप्रिसिएशन (गिरावट) भी लगातार जारी रहेगा।


बाजार के जानकारों और एक्सपर्ट्स की क्या है राय?


करेंसी मार्केट पर पैनी नज़र रखने वाले एक्सपर्ट्स भी मौजूदा हालात को लेकर काफी अलर्ट हैं। CR फॉरेक्स एडवाइजर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर अमित पाबारी ने इस स्थिति पर गहराई से अपनी बात रखी।




उनका कहना है, "रुपया अब एक बेहद जरूरी और नाजुक लेवल के पास पहुंच रहा है। 94.00 रुपये का मार्क एक बहुत ही मजबूत रेजिस्टेंस की तरह काम करेगा, क्योंकि इसका अपना एक साइकोलॉजिकल महत्व (मनोवैज्ञानिक असर) है। अगर दुनिया में तनाव कम होता है (डी-एस्केलेशन), तो हम रुपये में 1.00 से 1.50 रुपये तक की तेज रिकवरी देख सकते हैं। लेकिन, अगर युद्ध और धमकियों का यह लगातार तनाव बना रहा, तो करेंसी पर दबाव भी कम नहीं होगा।"


आगे क्या होने वाला है?




कुल मिलाकर देखा जाए तो भारतीय रुपये की चाल अब पूरी तरह से ग्लोबल न्यूज और विदेशी निवेशकों के मूड पर निर्भर कर रही है। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें शांत नहीं होतीं और पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध नहीं थमता, तब तक रुपये के लिए कोई भी रिकवरी करना एक पहाड़ चढ़ने जैसा होगा। निवेशकों और ट्रेडर्स को फिलहाल बाजार की हर छोटी-बड़ी खबर पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि आने वाले कुछ दिन भारतीय अर्थव्यवस्था और करेंसी मार्केट के लिए बेहद उतार-चढ़ाव भरे हो सकते हैं।


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(डिस्क्लेमर: यह खबर केवल जानकारी के उद्देश्य से लिखी गई है। शेयर बाजार में निवेश जोखिमों के अधीन है। अपना पैसा लगाने से पहले हमेशा किसी सर्टिफाइड फाइनेंसियल एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।)


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