Iran Israel War Impact: ईरान-इजरायल युद्ध और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बावजूद सोने की कीमतों में उछाल क्यों नहीं आ रहा है? जानिए मजबूत डॉलर और फेड रिजर्व का इस पर क्या असर है।
नई दिल्ली, 14 मार्चः पश्चिम एशिया में इस समय भारी तनाव है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच शुरू हुए युद्ध ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। आमतौर पर युद्ध और संकट के समय निवेशक सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने की तरफ भागते हैं, जिससे सोने की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा है। युद्ध के कारण 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' बंद होने से कच्चे तेल (WTI Crude) के दाम 60 डॉलर से उछलकर 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए हैं। महंगाई का डर बढ़ गया है। इसके बावजूद सोना एक सीमित दायरे में अटका हुआ है। इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका का मजबूत होता डॉलर और US फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना है। ऊंची ब्याज दरें सोने की चमक को फीका कर रही हैं। आगे जानिए सोने की चाल और भविष्य के अनुमान।
मिडिल ईस्ट में भयंकर युद्ध, फिर भी सोना शांत क्यों?
अक्सर देखा गया है कि जब भी दुनिया के किसी हिस्से में युद्ध होता है या भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव बढ़ता है, तो सोने की कीमतों में भारी उछाल आता है। लोग घबराहट में शेयर बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश (Safe Haven) माने जाने वाले सोने में पैसा लगाते हैं। लेकिन मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में छिड़े ताजा महायुद्ध के बीच सोने की चाल ने सभी को हैरान कर दिया है। भयंकर तनाव के बावजूद सोने के दाम स्थिर हैं। आइए कमोडिटी एक्सपर्ट प्रथमेश माल्या के नजरिए से समझते हैं इसके पीछे की पूरी कहानी।
झगड़े की असली जड़ क्या है?
अमेरिका और इजरायल लंबे समय से ईरान के परमाणु हथियार बनाने की कोशिशों के खिलाफ रहे हैं। इसी को रोकने के लिए 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों और बुनियादी ढांचे पर जोरदार हमले शुरू कर दिए। इन हमलों में 1989 से ईरान की सत्ता संभाल रहे सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई।
अब यह युद्ध सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि सऊदी अरब, लेबनान, इराक और UAE जैसे पड़ोसी देशों तक फैल चुका है। दुनिया का 20 प्रतिशत तेल जिस 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' (Strait of Hormuz) रास्ते से गुजरता है, वह सप्लाई भी ठप हो गई है।
कच्चा तेल उबला, लेकिन सोना क्यों अटका है?
रास्ता बंद होने से कच्चे तेल की कीमतों में आग लग गई है। WTI क्रूड 60 डॉलर प्रति बैरल के निचले स्तर से सीधे 110 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। इससे पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ने का डर सता रहा है।
अब सवाल उठता है कि इतनी अफरा-तफरी में सोना क्यों नहीं बढ़ रहा?
13 मार्च तक इंटरनेशनल मार्केट में सोना 5,277 डॉलर के उच्चतम और 5,054 डॉलर प्रति औंस के निचले स्तर के बीच ही घूमता रहा। भारतीय बाजार (MCX) पर भी 13 मार्च तक सोने की कीमतें 1,69,880 रुपये (27 फरवरी का हाई) से 1,59,350 रुपये प्रति 10 ग्राम की रेंज में ही रहीं।
डॉलर और ब्याज दरें हैं मुख्य वजह
दरअसल, दुनिया भर के निवेशक इस समय सोने की बजाय अमेरिकी "डॉलर" को सबसे सुरक्षित मानकर उसमें पैसा लगा रहे हैं। दूसरी तरफ, बढ़ती महंगाई को कंट्रोल करने के लिए US फेडरल रिज़र्व (अमेरिकी सेंट्रल बैंक) ब्याज दरें बढ़ा सकता है। अर्थशास्त्र का नियम है कि जब डॉलर मजबूत होता है और ब्याज दरें ऊंची होती हैं, तो सोने की कीमतें दबाव में आ जाती हैं। इसी विपरीत चाल के कारण सोने की तेजी पर ब्रेक लग गया है।
आगे कैसी रहेगी सोने की चाल?
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 5,165 डॉलर प्रति औंस के आसपास ट्रेड कर रहा है। आपको बता दें कि पिछले एक साल में सोने ने 80 प्रतिशत से ज्यादा का रिटर्न दिया है। अकेले 2025 में ही सोना 50 बार से ज्यादा अपने ऑल-टाइम हाई पर पहुंचा था।
आने वाले समय में सोने की चाल इन 3 स्थितियों पर निर्भर करेगी:
तेजी की स्थिति (Bullish): अगर दुनिया भर में मंदी आती है और युद्ध और भड़कता है, तो 2026 में सोने की कीमतें मौजूदा स्तर से 15 से 20 प्रतिशत तक और बढ़ सकती हैं।
मध्यम तेजी (Moderate): अगर अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ती है और फेड रिजर्व ब्याज दरों में थोड़ी कटौती करता है, तो सोने में 5 से 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिख सकती है।
मंदी की स्थिति (Bearish): अगर अमेरिका की ग्रोथ मजबूत रहती है और ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं, तो सोने में 5 से 20 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। हालांकि, मौजूदा हालात को देखते हुए इस बात की संभावना काफी कम है।
(डिस्क्लेमर: लेख में दिए गए विचार कमोडिटी एक्सपर्ट के निजी विचार हैं। न्यूज़ पोर्टल या मैनेजमेंट इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। कहीं भी निवेश करने से पहले अपने सर्टिफाइड वित्तीय सलाहकार से राय जरूर लें।)

