Central Banks Gold Purchase: जनवरी में दुनिया के केंद्रीय बैंकों की सोना खरीद गिरकर सिर्फ 5 टन रह गई। रूस ने रिजर्व बेचा, जबकि उज्बेकिस्तान टॉप खरीदार रहा। जानें इस गिरावट का असली कारण।
नई दिल्लीः दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों (Central Banks) के सोना खरीदने के तरीके में इस साल की शुरुआत में एक बड़ा और अचानक बदलाव देखने को मिला है। लगातार सोना इकट्ठा कर रहे इन बैंकों ने जनवरी के महीने में अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। सोने की कीमतों में होने वाले तेज उतार-चढ़ाव और कुछ मौसमी कारणों को देखकर केंद्रीय बैंकों ने इस बार काफी संभलकर खरीदारी की है। आइए इस रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं कि किस देश ने सोना खरीदा और किसने अपना भंडार खाली किया।
खरीदारी में आई भारी गिरावट
आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले 12 महीनों से दुनिया भर के केंद्रीय बैंक हर महीने औसतन करीब 27 टन सोना खरीद रहे थे। लेकिन, जनवरी के महीने में यह आंकड़ा धड़ाम से नीचे गिर गया और कुल खरीदारी सिर्फ 5 टन पर सिमट कर रह गई। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सोने के भाव में आ रहे बदलावों के कारण बैंकों ने वेट एंड वॉच (Wait and Watch) की नीति अपनाई है।
उज्बेकिस्तान बना सबसे बड़ा खरीदार
इस सुस्त बाजार में भी उज्बेकिस्तान (Uzbekistan) सबसे बड़ा खरीदार बनकर सामने आया है। देश के केंद्रीय बैंक ने जनवरी में अकेले 9 टन सोना खरीदा है। इस नई खरीद के बाद उज्बेकिस्तान का कुल स्वर्ण भंडार 399 टन तक पहुंच गया है। आपको जानकर हैरानी होगी कि साल 2020 में देश के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी सिर्फ 57% थी, जो अब बढ़कर 86% हो गई है।
मलेशिया और चीन का क्या रहा हाल?
मलेशिया के केंद्रीय बैंक ने भी लंबे समय बाद सोने के बाजार में वापसी की है। साल 2018 के बाद पहली बार मलेशिया ने 3 टन सोना खरीदा है। इसके साथ ही उनका कुल सोना भंडार 42 टन हो गया है, जो उनके कुल विदेशी भंडार का लगभग 5% है।
वहीं दूसरी तरफ, चीन लगातार सोने का भंडार बढ़ा रहा है। चीन के केंद्रीय बैंक ने जनवरी में 1 टन सोना खरीदा। यह लगातार 15वां महीना है जब चीन ने सोना खरीदा है। अब चीन के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी 10% के करीब पहुंच चुकी है।
रूस ने बेचा अपना सोना
जहां एक तरफ कुछ देश सोना जोड़ रहे हैं, वहीं रूस इस महीने सबसे बड़ा विक्रेता (Seller) रहा। रूस के केंद्रीय बैंक ने अपने भंडार से 9 टन सोना बेच दिया है। इसके अलावा, बुल्गारिया ने भी यूरो करेंसी को अपनाने के बाद अपने रिजर्व से 2 टन सोना यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) को ट्रांसफर कर दिया है।
डॉलर के मुकाबले रुपये पर क्या होगा असर?
सोने के अलावा अगर करेंसी बाजार की बात करें, तो केडिया एडवाइजरी (Kedia Advisory) ने एक अहम अनुमान जताया है। उनके अनुसार, आने वाले समय में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया दबाव में आ सकता है। USD/INR का स्तर 94.20 तक जाने की संभावना है।
रुपये पर दबाव के मुख्य कारण:
- अमेरिकी डॉलर की लगातार मजबूती।
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की ऊंची कीमतें।
- अमेरिका और भारत के बीच ब्याज दरों में बड़ा अंतर।
कुल मिलाकर देखा जाए तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में अभी काफी उथल-पुथल मची हुई है। सोने की कीमतों में अनिश्चितता के चलते केंद्रीय बैंक बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। वहीं करेंसी मार्केट में भी दबाव देखने को मिल रहा है। हालांकि, एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सही समय पर दखल देने से बाजार के इस तेज उतार-चढ़ाव को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है।

