Middle East conflict and Indian exporters: मिडिल ईस्ट में ईरान-इजराइल के बीच बढ़ते तनाव का असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ रहा है। लाल सागर संकट से ट्रांसपोर्ट और इंश्योरेंस कॉस्ट बढ़ने का डर है।

Middle East conflict and Indian exporters
नई दिल्ली: ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच चल रहे सैन्य टकराव ने अब एक बड़े युद्ध का रूप ले लिया है। इजराइल और अमेरिका के हमलों के बाद ईरान भी चुप नहीं है। उसने पलटवार करते हुए मिडिल ईस्ट के कई देशों जैसे कतर, कुवैत और UAE में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। इस गोलाबारी और मिसाइल हमलों का सीधा असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था और हमारे निर्यातकों (Exporters) पर पड़ने लगा है।
लगातार बढ़ रहे इस तनाव के कारण ग्लोबल सप्लाई चेन और व्यापार के रास्ते बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। भारतीय निर्यातकों को अब सबसे बड़ा डर इस बात का सता रहा है कि उनका सामान विदेश भेजने का खर्च और इंश्योरेंस का प्रीमियम कहीं आसमान न छूने लगे।
क्यों बढ़ रही है भारत की चिंता?
भारत का ज्यादातर व्यापार, खासकर कच्चा तेल (Crude Oil) और LNG का आयात, लाल सागर (Red Sea) और स्वेज नहर के रास्ते होता है। लेकिन युद्ध के कारण इस रूट पर खतरा बहुत बढ़ गया है।
लंबे रास्तों का इस्तेमाल: स्वेज नहर के बजाय अब जहाजों को 'केप ऑफ गुड होप' (अफ्रीका के नीचे से) का लंबा और धीमा रास्ता चुनना पड़ रहा है।
समय की बर्बादी: इस नए रास्ते से अमेरिका और यूरोप तक माल पहुंचने में 15 से 20 दिन का अतिरिक्त समय लग रहा है।
महंगा इंश्योरेंस: समंदर में बढ़ते खतरों को देखते हुए इंश्योरेंस कंपनियों ने मरीन इंश्योरेंस प्रीमियम काफी बढ़ा दिया है।
एक्सपर्ट्स का क्या कहना है?
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन (FIEO) के प्रेसिडेंट एससी रल्हन ने बताया कि युद्ध की वजह से लॉजिस्टिक्स के काम में बड़ी रुकावट आई है। हवा और समंदर दोनों के रास्ते बदले जा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है, तो न सिर्फ माल भाड़ा (Freight Rate) बढ़ेगा, बल्कि दुनिया भर में ऊर्जा की कीमतें भी बढ़ेंगी। इसका सीधा असर भारतीय रुपये की स्थिरता और इनपुट कॉस्ट पर पड़ेगा।
वहीं, अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन ए शक्तिवेल ने भी चिंता जताते हुए कहा कि पश्चिमी देशों में सामान भेजने में अब ज्यादा देरी होगी, जिससे व्यापारिक सौदों पर बुरा असर पड़ सकता है।
कच्चे तेल पर मंडरा रहा है खतरा
भारत अपनी जरूरत का लगभग 65 प्रतिशत कच्चा तेल इराक और सऊदी अरब जैसे देशों से इसी स्वेज नहर के रास्ते मंगवाता है। बाब-अल-मंडेब स्ट्रेट जो लाल सागर को जोड़ता है, वह व्यापारियों की पहली पसंद है क्योंकि यह रास्ता छोटा है। लेकिन अब यहां से गुजरना खतरे से खाली नहीं है।
पहले भी झेल चुके हैं ऐसा संकट
यह कोई पहली बार नहीं है। साल 2024 में इजराइल-हमास युद्ध के दौरान भी भारत को ऐसे ही हालात का सामना करना पड़ा था। इसकी शुरुआत 19 अक्टूबर 2023 को हुई थी, जब यमन के हूती विद्रोहियों ने लाल सागर से गुजरने वाले मालवाहक जहाजों पर हमले शुरू कर दिए थे। लेदर सेक्टर से जुड़े निर्यातकों का कहना है कि अगर यह युद्ध भी लंबा चला, तो पुरानी वाली मुश्किलें फिर से लौट आएंगी।
कुल मिलाकर, मिडिल ईस्ट की यह लड़ाई भारत के व्यापार के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन चुकी है। अगर जल्द ही हालात सामान्य नहीं हुए, तो महंगाई का असर सिर्फ एक्सपोर्टर्स तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर आम आदमी की जेब तक भी पहुंच सकता है।
