अमेरिका के 'शांति प्रस्ताव' पर भड़का ईरान: ट्रंप का 15 सूत्रीय प्लान खारिज, जंग रोकने के लिए रख दीं अपनी 5 बड़ी शर्तें

MoneySutraHub Team

Trump Peace Plan Iran: मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच एक बड़ी खबर सामने आई है। ईरान ने अमेरिका द्वारा भेजे गए 15 सूत्रीय शांति प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह प्रस्ताव पाकिस्तान के जरिए भेजा गया था, जिसमें ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ की भूमिका अहम थी। ईरानी अधिकारियों ने इसे एक "थोपा गया युद्ध" बताते हुए कहा है कि युद्ध कब खत्म होगा, इसका फैसला वाशिंगटन या डोनाल्ड ट्रंप नहीं, बल्कि तेहरान करेगा। इसके साथ ही ईरान ने युद्धविराम के लिए अपनी खुद की 5 सख्त शर्तें दुनिया के सामने रख दी हैं, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य पर संप्रभुता और भारी हर्जाने की मांग शामिल है। इस लेख में जानें कि अमेरिका ने क्या ऑफर दिया था और ईरान ने पलटवार करते हुए क्या मांगें रखी हैं, जिससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है।

Iran Rejects US Proposal

नई दिल्ली, 25 मार्चः मध्य पूर्व (Middle East) में चल रहा संघर्ष अब एक नए और खतरनाक मोड़ पर आ गया है। दुनिया भर की नजरें इस बात पर टिकी थीं कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच चल रही तनातनी बातचीत की मेज पर सुलझ पाएगी? लेकिन ताजा घटनाक्रम ने शांति की उम्मीदों को बड़ा झटका दिया है। ईरान ने अमेरिका की तरफ से भेजे गए युद्धविराम और शांति के प्रस्ताव को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।


ईरानी मीडिया और आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका ने पाकिस्तान के जरिए ईरान को एक 15 सूत्रीय 'पीस प्लान' (Peace Plan) भेजा था। लेकिन ईरान ने न केवल इस प्रस्ताव को मानने से इनकार कर दिया, बल्कि दो टूक शब्दों में यह कह दिया कि यह युद्ध उन पर थोपा गया है और इसे खत्म करने की टाइमलाइन अमेरिका तय नहीं कर सकता। ईरान ने पलटवार करते हुए अपनी खुद की 5 शर्तें रख दी हैं, जिन्हें माने बिना वह पीछे हटने को तैयार नहीं है।


क्या है पूरा मामला?


पिछले कुछ समय से अमेरिका और ईरान के बीच अघोषित युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। इस तनाव को कम करने के लिए अमेरिका के पूर्व और आगामी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन (विशेष दूतों के माध्यम से) ने कूटनीतिक चैनल खोलने की कोशिश की थी। मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ (Steve Witkoff) ने मध्यस्थों के जरिए एक प्रस्ताव तैयार किया था।


चूंकि अमेरिका और ईरान के बीच सीधे राजनयिक संबंध नहीं हैं, इसलिए इस संदेश को पहुंचाने के लिए पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाया गया था। अमेरिका चाहता था कि ईरान कुछ शर्तों को माने ताकि क्षेत्र में शांति बहाल हो सके और प्रतिबंध हटाए जा सकें। लेकिन तेहरान (ईरान की राजधानी) से आया जवाब वाशिंगटन के लिए निराशाजनक रहा है।


ईरान का कड़ा रुख और "थोपा गया युद्ध"


ईरान के सरकारी टीवी चैनल 'प्रेस टीवी' (Press TV) ने एक सीनियर अधिकारी के हवाले से बड़ा दावा किया है। अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ईरान ने अमेरिका के प्रस्ताव का नकारात्मक (Negative) जवाब दिया है।


ईरानी अधिकारी का बयान बेहद आक्रामक था। उन्होंने कहा:


"यह एक थोपा गया युद्ध है। इसका अंत तभी होगा, जब ईरान तय करेगा, न कि ट्रंप या कोई और।"


उधर, बेरूत स्थित टीवी चैनल अल मायादीन (Al Mayadeen) ने भी राजनीतिक और सुरक्षा सूत्रों के हवाले से पुष्टि की है कि ईरान ने पाकिस्तान को अपना स्पष्ट रुख बता दिया है। ईरान ने साफ कर दिया है कि मौजूदा हालात में अमेरिका के 15 सूत्रीय प्रस्ताव पर बातचीत करना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है और वे इसे मंजूर नहीं कर सकते।


Iran's 5 Conditions: ईरान ने रखीं ये 5 बड़ी शर्तें


अमेरिका के प्रस्ताव को खारिज करने के बाद, ईरान ने दुनिया को बता दिया है कि वह किन शर्तों पर युद्ध रोकने को तैयार होगा। ये शर्तें न केवल सख्त हैं, बल्कि अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए इन्हें मानना बेहद मुश्किल हो सकता है।



ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान की 5 मुख्य शर्तें इस प्रकार हैं:


1) सैन्य आक्रामकता पर पूर्ण विराम: 'दुश्मन' (अमेरिका और उसके सहयोगी) की तरफ से किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई, हवाई हमले और हत्याओं (Targeted Killings) पर तुरंत और पूरी तरह रोक लगाई जाए।


2) भविष्य की सुरक्षा गारंटी: ईरान ने मांग की है कि उसे एक ठोस और लिखित गारंटी दी जाए कि भविष्य में उस पर फिर कभी युद्ध नहीं थोपा जाएगा।


3) हर्जाने की मांग (Reparations): युद्ध के दौरान ईरान को जो भी आर्थिक और ढांचागत नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई के लिए गारंटी के साथ हर्जाना दिया जाए।


4) सभी मोर्चों पर युद्धबंदी: केवल ईरान ही नहीं, बल्कि क्षेत्र में मौजूद सभी 'रेजिस्टेंस समूहों' (Resistance Groups - जैसे हिजबुल्लाह, हूती आदि) पर हो रहे हमले भी बंद किए जाएं। यानी सभी मोर्चों पर युद्ध खत्म हो।


5) स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर अधिकार: सबसे बड़ी और विवादास्पद शर्त यह है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) पर ईरान के संप्रभु अधिकार (Sovereign Rights) को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दी जाए और इसकी गारंटी सुनिश्चित की जाए।


स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज की शर्त सबसे अहम क्यों?


ईरान की 5वीं शर्त सबसे ज्यादा रणनीतिक महत्व रखती है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है। दुनिया का लगभग 20% से 30% कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। अमेरिका इसे एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग मानता है और इसे 'फ्री मैरीटाइम जोन' रखना चाहता है।


वहीं, ईरान चाहता है कि इस पर उसके अधिकार को मान्यता मिले। अगर ऐसा होता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर ईरान का सीधा नियंत्रण हो जाएगा, जिसे अमेरिका और पश्चिमी देश कभी स्वीकार नहीं करेंगे। यह एक ऐसा बिंदु है जहां समझौता होना लगभग असंभव लगता है।


US 15-Point Proposal: अमेरिका ने क्या प्रस्ताव भेजा था?


ईरान की शर्तों को समझने के बाद यह जानना भी जरूरी है कि आखिर अमेरिका ने क्या ऑफर दिया था जिसे ईरान ने ठुकरा दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका का 15 सूत्रीय प्लान ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने पर केंद्रित था।




अमेरिका की प्रमुख शर्तें थीं:


परमाणु कार्यक्रम का अंत: ईरान को अपनी सभी परमाणु क्षमताओं को पूरी तरह खत्म करना होगा।


यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) बंद: ईरान अपनी धरती पर यूरेनियम को एनरिच करने का काम पूरी तरह बंद करेगा।


लिखित प्रतिबद्धता: ईरान को लिखित में वादा करना होगा कि वह कभी परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं करेगा।


फ्री मैरीटाइम जोन: होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से 'फ्री मैरीटाइम जोन' घोषित किया जाए ताकि जहाजों की आवाजाही बिना रोक-टोक हो सके।


मिसाइल प्रोग्राम पर रोक: ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों की रेंज और उनके स्टॉक पर सख्त सीमाएं तय की जाएंगी।


सहयोगी गुटों की मदद बंद: ईरान को मिडिल ईस्ट में अपने प्रॉक्सी ग्रुप्स (जैसे लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूती और फिलिस्तीन में हमास) को हथियार और पैसा देना बंद करना होगा।


30 दिनों का युद्धविराम: इन मुद्दों पर विस्तार से बात करने के लिए अमेरिका ने 30 दिनों के सीजफायर का प्रस्ताव दिया था।


बदले में अमेरिका क्या दे रहा था?


अमेरिका ने वादा किया था कि अगर ईरान ये शर्तें मानता है, तो:


उस पर लगे सभी परमाणु प्रतिबंध (Nuclear Sanctions) हटा लिए जाएंगे। ईरान को बुशहर रिएक्टर (Bushehr Reactor) के जरिए शांतिपूर्ण कार्यों के लिए बिजली बनाने (Civilian Nuclear Energy Program) में मदद दी जाएगी। स्नैपबैक मैकेनिज्म (Snapback Mechanism) को हटा दिया जाएगा, जिसका मतलब है कि भविष्य में प्रतिबंध अपने आप दोबारा लागू नहीं होंगे।


दुनिया पर क्या असर होगा?


इस कूटनीतिक विफलता का असर सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। इसके वैश्विक प्रभाव गंभीर हो सकते हैं:


कच्चे तेल की कीमतें (Crude Oil Prices): चूंकि मामला स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से जुड़ा है, इसलिए तनाव बढ़ने पर तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है। भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए यह बुरी खबर हो सकती है।


क्षेत्रीय अस्थिरता: ईरान ने स्पष्ट किया है कि जब तक उसके सहयोगी समूहों (Proxies) पर हमले नहीं रुकते, युद्ध जारी रहेगा। इसका मतलब है कि इजरायल-लेबनान और यमन में संघर्ष और तेज हो सकता है।


शिपिंग रूट्स: लाल सागर और फारस की खाड़ी में व्यापारिक जहाजों पर खतरे बढ़ सकते हैं, जिससे ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित होगी।


आगे क्या होगा?


रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों पक्षों की शर्तें एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं।


अमेरिका चाहता है कि ईरान निहत्था (Disarmed) हो जाए। ईरान चाहता है कि अमेरिका क्षेत्र से हट जाए और उसे नुकसान की भरपाई करे। इन दोनों स्थितियों के बीच फिलहाल कोई 'मिडिल ग्राउंड' नजर नहीं आ रहा है। पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिश का विफल होना यह दर्शाता है कि भरोसे की कमी (Trust Deficit) बहुत गहरी है। ईरान को लगता है कि परमाणु कार्यक्रम बंद करने से वह कमजोर हो जाएगा, जैसा कि गद्दाफी के साथ लीबिया में हुआ था। वहीं, अमेरिका ईरान को परमाणु शक्ति संपन्न होते नहीं देख सकता। संभावना यही है कि आने वाले दिनों में प्रतिबंध और कड़े होंगे और छिटपुट सैन्य झड़पें (Skirmishes) जारी रह सकती हैं।


अनिश्चितता का दौर


ईरान द्वारा अमेरिका के प्रस्ताव को खारिज करना और अपनी सख्त शर्तें रखना यह साबित करता है कि तेहरान अब झुकने के मूड में नहीं है। "थोपा गया युद्ध" और "हम तय करेंगे अंत" जैसे बयान ईरान के आत्मविश्वास और आक्रामकता को दर्शाते हैं। अब गेंद अमेरिका के पाले में है। क्या ट्रंप प्रशासन (या मौजूदा अमेरिकी सरकार) अपनी शर्तों में ढील देगा, या फिर 'मैक्सिमम प्रेशर' (Maximum Pressure) की नीति को और आक्रामक बनाएगा? यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल, शांति की उम्मीदें धूमिल नजर आ रही हैं।


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