Google और Big Tech हैं आज की 'East India Company'! Zoho फाउंडर ने क्यों दी खतरे की घंटी?

MoneySutraHub Team

गूगल की पैरेंट कंपनी Alphabet ने 24 घंटे में 3200 करोड़ जुटाकर दुनिया को चौंका दिया है। इस पर Zoho के श्रीधर वेंबू ने इन्हें 'नई ईस्ट इंडिया कंपनी' बताया है। जानें इस चेतावनी के पीछे की असली वजह।

Zoho Founder Sridhar Vembu Google Alphabet bond issue

क्या हम एक बार फिर गुलामी के दौर की तरफ बढ़ रहे हैं? लेकिन इस बार जंजीरें लोहे की नहीं, बल्कि डेटा और टेक्नोलॉजी की होंगी। यह सवाल हम नहीं, बल्कि   ारत की दिग्गज सॉफ्टवेयर कंपनी जोहो कॉरपोरेशन (Zoho Corporation) के को-फाउंडर श्रीधर वेंबू (Sridhar Vembu) उठा रहे हैं।


टेक्नोलॉजी की दुनिया में पिछले कुछ दिनों से एक खबर ने सबको चौंका रखा है। Google की पैरेंट कंपनी अल्फाबेट (Alphabet) ने शेयर बाजार में अपनी वित्तीय ताकत का ऐसा प्रदर्शन किया है, जिसने बड़े-बड़े देशों की सरकारों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। इस घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए श्रीधर वेंबू ने एक बार फिर वैश्विक बिग टेक (Big Tech) कंपनियों की तुलना अंग्रेजों की 'ईस्ट इंडिया कंपनी' (East India Company) से कर दी है।


आखिर एक टेक कंपनी के फाउंडर को दूसरी टेक कंपनियों से इतना खतरा क्यों महसूस हो रहा है? आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।


क्या है पूरा मामला?


हाल ही में खबर आई कि गूगल (Google) की मूल कंपनी अल्फाबेट (Alphabet) ने बॉन्ड मार्केट से भारी-भरकम रकम जुटाई है। हैरानी की बात यह है कि कंपनी ने महज 24 घंटे के भीतर 3200 करोड़ (यानी 32 बिलियन डॉलर) की राशि जुटा ली।


इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए 14 फरवरी को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (जिसे पहले Twitter कहा जाता था) पर एक बहस छिड़ गई। इसी दौरान श्रीधर वेंबू ने एक पोस्ट का रिप्लाई करते हुए अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि आज की ये विशालकाय टेक कंपनियां सिर्फ बिजनेस नहीं कर रही हैं, बल्कि वे "वित्तीय और रणनीतिक शक्ति" के मामले में कई स्वतंत्र देशों (Sovereign Nations) के बराबर या उनसे भी आगे निकल चुकी हैं।


वेंबू का मानना है कि इन कंपनियों के काम करने के तरीके और इनकी बढ़ती ताकत को समझने का सबसे सही उदाहरण इतिहास की 'ईस्ट इंडिया कंपनी' ही हो सकती है।


Google की ताकत और 'ईस्ट इंडिया कंपनी' का डर


श्रीधर वेंबू की इस टिप्पणी को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में सिर्फ व्यापार करने आई थी। शुरुआत में वे मसाले और कपड़े का कारोबार करते थे। लेकिन धीरे-धीरे उनकी आर्थिक ताकत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने राजा-महाराजाओं को कर्ज देना शुरू किया, अपनी सेना बनाई और अंततः पूरे देश की सत्ता अपने हाथ में ले ली।


वेंबू का इशारा इसी ओर है। आज Google, Amazon, Facebook और Microsoft जैसी कंपनियों के पास इतना पैसा है कि वे किसी भी छोटे देश की जीडीपी (GDP) से मुकाबला कर सकती हैं।


वेंबू के ट्वीट के मुख्य बिंदु


अथाह पैसा: अल्फाबेट द्वारा इतनी जल्दी इतना बड़ा कर्ज जुटाना यह दिखाता है कि निवेशकों का भरोसा अब सरकारों से ज्यादा इन कंपनियों पर है।

भू-राजनीतिक असर: ये कंपनियां अब सिर्फ बाजार नहीं चला रहीं, बल्कि अपनी आर्थिक ताकत से दो देशों के बीच के रिश्तों और राजनीति (Geo-politics) को भी प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं।

बढ़ती निर्भरता: जिस तरह पहले हम विदेशी सामान के लिए निर्भर थे, आज हम डेटा और कम्युनिकेशन के लिए इन कंपनियों पर निर्भर हैं।


100 साल के बॉन्ड का क्या है मतलब?

इस पूरी बहस में एक बहुत ही तकनीकी लेकिन महत्वपूर्ण बात सामने आई है—'बॉन्ड की अवधि'। श्रीधर वेंबू ने जिस ट्वीट पर रिप्लाई किया, उसमें एक चौंकाने वाला तथ्य था।


अल्फाबेट (Google) ने जो पैसा बाजार से उठाया है, उसके लिए उसने 100 साल की अवधि वाले बॉन्ड जारी किए हैं। दूसरी तरफ, अगर हम भारत सरकार के सोवरेन बॉन्ड (Sovereign Bonds) की बात करें, तो वे आमतौर पर अधिकतम 40 साल की अवधि के लिए होते हैं।


इसका मतलब क्या है?


आसान भाषा में समझें तो, निवेशकों को यह भरोसा है कि Google जैसी कंपनी अगले 100 साल तक न सिर्फ टिकेगी, बल्कि मुनाफा भी कमाएगी और उनका पैसा लौटाएगी। यह भरोसा किसी देश की सरकार पर जताए जाने वाले भरोसे से भी ज्यादा गहरा दिखाई दे रहा है। जब एक प्राइवेट कंपनी की साख किसी देश की सरकार से ज्यादा हो जाए, तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है।


पहले भी दे चुके हैं ऐसी चेतावनी


यह पहली बार नहीं है जब श्रीधर वेंबू ने बिग टेक कंपनियों के खिलाफ इतना कड़ा रुख अपनाया है। वे लगातार 'डिजिटल संप्रभुता' (Digital Sovereignty) की वकालत करते रहे हैं।


अभी कुछ ही हफ्ते पहले, जनवरी महीने में एक और घटना हुई थी जिसने वेंबू को बोलने पर मजबूर किया था। फ्रांस की सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए अपने सरकारी कामकाज के लिए अमेरिकी कंपनियों के वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ऐप्स (जैसे Zoom और Microsoft Teams) को छोड़ने का निर्णय लिया। इसके बजाय, उन्होंने अपने घरेलू प्लेटफॉर्म 'विजियो' (Visio) को अपनाने की बात कही।


उस समय भी श्रीधर वेंबू ने फ्रांस के इस कदम की तारीफ की थी और कहा था कि यूरोप अब जाकर "डिजिटल पावर के केंद्रीकरण" के खतरे को पहचान रहा है। उन्होंने कहा था कि हर देश को अपने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर अपना कंट्रोल रखना चाहिए, न कि किसी विदेशी कंपनी के भरोसे रहना चाहिए।


क्यों खतरनाक है ये 'नया उपनिवेशवाद'?


श्रीधर वेंबू की बातों में दम है। अगर हम आज की स्थिति देखें, तो हम पाएंगे कि हमारी जिंदगी का हर हिस्सा इन कंपनियों के पास है:


डेटा का कंट्रोल: हम क्या खाते हैं, कहां जाते हैं, क्या बात करते हैं—सब कुछ गूगल और मेटा जैसी कंपनियों के पास स्टोर है। पुराने जमाने में ईस्ट इंडिया कंपनी लगान वसूलती थी, आज ये कंपनियां हमारा डेटा वसूल रही हैं।

बिजनेस पर कब्जा: छोटी स्टार्टअप कंपनियां इनके सामने टिक नहीं पातीं। या तो ये बड़ी कंपनियां उन्हें खरीद लेती हैं या फिर मार्केट से बाहर कर देती हैं।

सरकारों पर दबाव: इनके पास इतना पैसा है कि ये लॉबिंग के जरिए अलग-अलग देशों की नीतियों (Policies) को अपने फायदे के लिए बदलवा सकती हैं।


भारत के लिए क्या है सबक?


श्रीधर वेंबू खुद एक भारतीय उद्यमी हैं और उन्होंने Zoho को एक ग्लोबल ब्रांड बनाया है, वह भी बिना किसी बाहरी भारी-भरकम फंडिंग के। उनका यह बयान भारत के लिए एक तरह से 'जागो ग्राहक जागो' जैसा है।


भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा डेटा मार्केट है। अगर हम अपनी खुद की टेक्नोलॉजी (जैसे UPI, ONDC आदि) विकसित नहीं करेंगे, तो हम हमेशा इन सिलिकॉन वैली की कंपनियों के गुलाम बने रहेंगे। वेंबू का संदेश साफ है—हमें 'आत्मनिर्भर भारत' सिर्फ विनिर्माण (Manufacturing) में ही नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी और डेटा के क्षेत्र में भी बनना होगा।


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इतिहास गवाह है कि जब भी किसी एक व्यापारिक समूह के पास असीमित ताकत आई है, उसका परिणाम आम जनता के लिए अच्छा नहीं रहा है। 24 घंटे में 3200 करोड़ जुटाना अल्फाबेट के लिए एक बिजनेस की सफलता हो सकती है, लेकिन दुनिया के लिए यह एक संकेत है कि शक्ति का संतुलन बिगड़ रहा है। श्रीधर वेंबू की ईस्ट इंडिया कंपनी वाली तुलना शायद थोड़ी कड़वी लगे, लेकिन यह भविष्य की एक ऐसी तस्वीर दिखा रही है जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। अब समय आ गया है कि देश और सरकारें अपनी 'डिजिटल सीमाओं' की सुरक्षा के बारे में गंभीरता से सोचें।

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