EAM Jaishankar On Russian Oil: विदेश मंत्री एस जयशंकर ने म्यूनिख में साफ कर दिया कि भारत रूसी तेल पर फैसला अपनी शर्तों पर लेगा, न कि अमेरिकी दबाव में। जानिए ट्रेड डील और तेल आयात की पूरी सच्चाई।

EAM Jaishankar On Russian Oil: जयशंकर ने दोटूक कहा कि भारतीय तेल कंपनियां उपलब्धता और लागत के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेती हैं।
EAM Jaishankar On Russian Oil: दुनियाभर में अपनी बेबाक कूटनीति के लिए मशहूर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर (S. Jaishankar) ने एक बार फिर पश्चिमी देशों और अमेरिका को आईना दिखाने का काम किया है। म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (Munich Security Conference) के मंच से जयशंकर ने साफ शब्दों में कह दिया है कि भारत अपनी नीतियों का निर्माण खुद करेगा और किसी भी बाहरी दबाव के आगे नहीं झुकेगा।
हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच एक बड़ी और ऐतिहासिक 'ट्रेड डील' (Trade Deal) साइन हुई है। इस डील के बाद से अंतरराष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर थी कि अब भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा। अमेरिकी नेताओं की तरफ से भी ऐसे दावे किए जा रहे थे। लेकिन, जयशंकर ने इन सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) बिकाऊ नहीं है।
अमेरिका को सीधा संदेश: 'फैसले हमारे होंगे, शर्तें आपकी नहीं'
इस पूरे विवाद की जड़ तब शुरू हुई जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो (Marco Rubio) ने एक बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि नए व्यापार ढांचे के तहत भारत ने रूसी तेल न खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है। मामला यहीं नहीं रुका, बल्कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) का हवाला देते हुए यह कहा गया कि भारत अब रूसी तेल को छोड़कर अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों की खरीद बढ़ाएगा।
इन बयानों ने भारत में भी सियासी हलचल बढ़ा दी थी। क्या भारत ने अमेरिका के आगे घुटने टेक दिए हैं? क्या रूस के साथ हमारे पुराने संबंध खत्म हो रहे हैं? इन सवालों का जवाब जयशंकर ने म्यूनिख में जर्मन विदेश मंत्री जोहान वेडफुल की मौजूदगी में दिया।
जयशंकर ने तल्ख लेकिन सधे हुए अंदाज में कहा, "रणनीतिक स्वायत्तता हमारे इतिहास और हमारे विकास का एक अभिन्न हिस्सा है। क्या मैं एक स्वतंत्र सोच रखूंगा? क्या मैं अपने फैसले खुद लूंगा? क्या मैं ऐसे चुनाव करूंगा जो शायद आपकी या किसी और की सोच से मेल न खाएं? जी हां, ऐसा बिल्कुल हो सकता है और यही भारत की पहचान है।"
उनका यह बयान वाशिंगटन के लिए सीधा संकेत था कि ट्रेड डील का मतलब यह नहीं है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) और विदेश नीति को अमेरिका के हिसाब से चलाएगा।
तेल कंपनियों के फैसले: राजनीति नहीं, 'शुद्ध व्यापार'
अक्सर पश्चिमी मीडिया यह दिखाने की कोशिश करता है कि भारत द्वारा रूस से तेल खरीदना एक 'राजनीतिक कदम' है। जयशंकर ने इस नैरेटिव को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने समझाया कि तेल खरीदना या बेचना सरकारों का नहीं, बल्कि तेल कंपनियों का काम है और उनका गणित बहुत सीधा होता है।
जयशंकर ने तर्क दिया कि जिस तरह यूरोप की कंपनियां तेल खरीदते वक्त यह देखती हैं कि तेल कहां उपलब्ध है, उसकी लागत (Cost) क्या है और उसे लाने में जोखिम (Risk) कितना है, ठीक उसी तरह भारतीय कंपनियां भी काम करती हैं।
उन्होंने कहा, "भारतीय कंपनियां अपने हित में फैसले लेती हैं। अगर उन्हें रूस से सस्ता तेल मिलेगा, तो वे उसे खरीदेंगी। अगर कहीं और से बेहतर डील मिलेगी, तो वे वहां जाएंगी। यह पूरी तरह से बाजार की स्थितियों पर निर्भर करता है।" जयशंकर ने यह भी याद दिलाया कि दुनिया अब 2022 या 2023 के दौर में नहीं है। हालात बदल चुके हैं और हर देश, चाहे वह यूरोप हो या भारत, अपनी जनता की सुविधा और अपनी जेब के अनुसार फैसले ले रहा है।
आंकड़े क्या कहते हैं? क्यों घट रहा है रूसी तेल का आयात?
भले ही भारत ने आधिकारिक तौर पर रूस से तेल खरीदना बंद नहीं किया है, लेकिन हालिया आंकड़े बताते हैं कि आयात में भारी गिरावट आई है। यह गिरावट अमेरिका के डर से नहीं, बल्कि बाजार के गणित की वजह से है।
ऊर्जा कार्गो पर नजर रखने वाली संस्था 'केप्लर' (Kpler) के डेटा बताते हैं कि भारत का रूसी तेल आयात 3 साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है। आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति कुछ ऐसी है:
जून 2025: इस समय भारत रूस से प्रतिदिन लगभग 20.9 लाख बैरल तेल खरीद रहा था।
जनवरी 2026: यह आंकड़ा घटकर मात्र 11.6 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट इसलिए नहीं है कि भारत पर कोई राजनीतिक दबाव है, बल्कि इसके पीछे मुख्य कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव और प्रतिबंधों (Sanctions) से जुड़े जोखिम हैं। जब रूसी तेल पर डिस्काउंट कम हो जाता है या शिपिंग की लागत बढ़ जाती है, तो भारतीय रिफाइनरी कंपनियां दूसरे विकल्पों (जैसे इराक या सऊदी अरब) की तरफ मुड़ जाती हैं। यह वही 'व्यापारिक फैसला' है जिसका जिक्र जयशंकर ने अपने भाषण में किया।
यूरोप को नसीहत और BRICS का संतुलन
म्यूनिख का मंच केवल अमेरिका को जवाब देने के लिए नहीं था, बल्कि जयशंकर ने यूरोपीय संघ (EU) के साथ भारत के रिश्तों पर भी जोर दिया। उन्होंने यूरोप के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों की वकालत की।
यह साल भारत के लिए कूटनीतिक रूप से बेहद अहम है क्योंकि भारत BRICS समूह की अध्यक्षता कर रहा है। पश्चिमी देश अक्सर BRICS को अपने खिलाफ एक गुट के रूप में देखते हैं, खास तौर पर इसमें रूस और चीन की मौजूदगी के कारण। लेकिन भारत ने हमेशा संतुलन बनाए रखा है।
जर्मन विदेश मंत्री जोहान वेडफुल ने भी जयशंकर की बातों से सहमति जताते हुए स्वीकार किया कि भले ही रूस और चीन को लेकर यूरोप की अपनी चिंताएं हैं, लेकिन भारत और ब्राजील जैसे देशों के साथ यूरोप को अपना जुड़ाव बढ़ाना ही होगा। यह बयान साबित करता है कि आज के दौर में भारत को नजरअंदाज करके कोई भी वैश्विक नीति सफल नहीं हो सकती।
भारत का साफ संदेश
एस जयशंकर के इस बयान ने एक बात पूरी तरह साफ कर दी है कि 'न्यू इंडिया' अपनी शर्तों पर दुनिया से रिश्ता निभाता है। अमेरिका के साथ ऐतिहासिक ट्रेड डील अपनी जगह है और रूस के साथ ऊर्जा संबंध अपनी जगह। भारत न तो अमेरिका का पिछलग्गू बनेगा और न ही किसी दबाव में अपनी जनता के हितों से समझौता करेगा। तेल कहां से खरीदना है, यह फैसला वाशिंगटन के व्हाइट हाउस में नहीं, बल्कि नई दिल्ली में और भारतीय तेल कंपनियों के बोर्ड रूम में लिया जाएगा।
जयशंकर का यह 'दोटूक जवाब' न केवल भारतीय विदेश नीति की मजबूती को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि 2026 में भारत एक ऐसी वैश्विक शक्ति बन चुका है जो अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' की रक्षा करना बखूबी जानता है।
