Railway PSU Stake Sale: सरकार ने अगले 4 सालों में रेलवे की 7 कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है। जानिए किन कंपनियों के नाम हैं लिस्ट में और निवेशकों पर क्या होगा इसका असर।
Railway PSU Stake Sale:अगर आपके पोर्टफोलियो में रेलवे के शेयर शामिल हैं या आप शेयर बाजार में सरकारी कंपनियों (PSU) पर नजर रखते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है। भारतीय रेलवे, जो देश की लाइफलाइन कही जाती है, अब सरकार के लिए फंड जुटाने का एक बड़ा जरिया बनने जा रही है। सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए रेलवे के अधीन आने वाली 7 बड़ी सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचने की योजना तैयार की है।
इस योजना का मकसद अगले चार सालों में करीब 80,000 करोड़ रुपये जुटाना है। यह खबर बाजार के जानकारों और निवेशकों के लिए एक बड़े संकेत की तरह है। आइए, इस पूरी खबर को आसान भाषा में समझते हैं और जानते हैं कि इसका आप पर और बाजार पर क्या असर पड़ने वाला है।
क्या है सरकार का 80,000 करोड़ का प्लान?
सूत्रों के मुताबिक, सरकार ने वित्त वर्ष 2027 से 2030 के बीच, यानी अगले चार सालों का एक रोडमैप तैयार किया है। इस दौरान सरकार रेलवे की 7 लिस्टेड कंपनियों (Listed PSUs) में अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचेगी। यह बिक्री 'ऑफर फॉर सेल' (OFS) के जरिए की जाएगी।
सरल शब्दों में समझें तो, सरकार इन कंपनियों में मालिक बनी रहेगी, लेकिन अपना थोड़ा सा हिस्सा शेयर बाजार में आम निवेशकों और संस्थाओं को बेच देगी। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह प्रक्रिया एक बार में नहीं, बल्कि कई चरणों में पूरी की जाएगी।
फैसला कहाँ और कैसे लिया गया?
इस बड़ी योजना की रूपरेखा नीति आयोग (NITI Aayog) में तय की गई है। कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन की अध्यक्षता में सचिवों के एक समूह ने 'एसेट मोनेटाइजेशन' (Asset Monetization) पर चर्चा की थी। यह उसी चर्चा का हिस्सा है। सरकार का लक्ष्य अपनी संपत्ति का सही इस्तेमाल करके पूंजी जुटाना है, ताकि उस पैसे को रेलवे के विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर में लगाया जा सके।
अधिकारी ने बताया, "पूंजी जुटाने के लिए सरकार इनमें से कुछ कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 51% तक ला सकती है।" यानी सरकार कम से कम 51% शेयर अपने पास रखेगी ताकि कंपनी पर उसका कंट्रोल बना रहे, और बाकी हिस्सा बाजार में बेच दिया जाएगा।
किन 7 कंपनियों के शेयर बेचेगी सरकार?
यह सबसे अहम सवाल है। सरकार जिन कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचने पर विचार कर रही है, वे शेयर बाजार की जानी-मानी कंपनियां हैं। इन सभी में अभी सरकार की होल्डिंग (हि हिस्सेदारी) काफी ज्यादा है। नीचे दी गई लिस्ट में देखिए कि किस कंपनी में अभी सरकार के पास कितना हिस्सा है:
इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन (IRFC): इसमें सरकार की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 86.36% है। यह कंपनी रेलवे को फंड देने का काम करती है।
रेल विकास निगम लिमिटेड (RVNL): इसमें सरकार के पास 72.8% हिस्सा है। यह कंपनी रेलवे प्रोजेक्ट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का काम करती है।
राइट्स (RITES): इसमें सरकार की हिस्सेदारी 72.2% है। यह कंसल्टेंसी और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में काम करती है।
इरकॉन इंटरनेशनल (IRCON): इसमें सरकार की हिस्सेदारी 65.17% है। यह रेलवे के निर्माण कार्यों में लगी हुई प्रमुख कंपनी है।
रेलटेल कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (RailTel): इसमें भी सरकार के पास 65.17% हिस्सा है। यह कंपनी रेलवे स्टेशनों पर वाई-फाई और टेलीकॉम सेवाएं देती है।
इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन (IRCTC): इसमें सरकार की हिस्सेदारी 62.4% है। यह रेलवे की टिकट बुकिंग और खाने-पीने का जिम्मा संभालती है।
कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (CONCOR): इसमें सरकार के पास 54.8% हिस्सा है। यह माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स का काम करती है।
क्यों बेची जा रही है हिस्सेदारी? (बड़ी वजह)
आप सोच रहे होंगे कि जब ये कंपनियां अच्छा काम कर रही हैं, तो सरकार हिस्सा क्यों बेच रही है? इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:
सेबी (SEBI) का नियम: शेयर बाजार के नियमों के मुताबिक, किसी भी लिस्टेड कंपनी में पब्लिक शेयरहोल्डिंग (आम जनता की हिस्सेदारी) कम से कम 25% होनी चाहिए। कई सरकारी कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी 75% से ज्यादा है, जिसे कम करना जरूरी है।
पैसा जुटाना (Fundraising): सरकार को रेलवे के आधुनिकीकरण, नई पटरियाँ बिछाने और हाई-स्पीड ट्रेनों के लिए बहुत पैसे की जरूरत है। यह विनिवेश (Disinvestment) उसी नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन (NMP 2.0) का हिस्सा है, जिसके तहत रेलवे के लिए 2.5 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
ईवाई इंडिया (EY India) के पार्टनर और इंफ्रास्ट्रक्चर लीडर, कुलजीत सिंह का कहना है कि अभी इन कंपनियों का कुल मार्केट कैप लगभग 3.5 लाख करोड़ रुपये है। उन्होंने कहा, "ज्यादातर कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी 51% से काफी ज्यादा है। अगर सरकार इन सभी में औसतन 20% हिस्सेदारी भी बेचती है, तो वह आसानी से 70,000 करोड़ रुपये जुटा सकती है।"
यानी, सरकार के पास अपनी तिजोरी भरने का यह एक सॉलिड प्लान है, बिना कंपनियों पर से अपना मालिकाना हक खोए।
कनकोर (CONCOR) का पुराना मामला और चुनौतियां
ऐसा नहीं है कि सरकार के लिए यह राह एकदम आसान है। इसका एक उदाहरण 'कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया' (CONCOR) है। सरकार ने करीब 6 साल पहले इसमें अपनी 30.8% हिस्सेदारी बेचकर इसे निजी हाथों में सौंपने (निजीकरण) का ऐलान किया था। लेकिन, 6 साल बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई है।
हालांकि, इस बार सरकार 'निजीकरण' (Privatization) की जगह 'बिक्री प्रस्ताव' (OFS) का रास्ता चुन रही है, जो थोड़ा आसान और तेज तरीका माना जाता है।
नियमों में हो सकता है बड़ा बदलाव
एक और दिलचस्प बात सामने आ रही है। वित्त वर्ष 2025-26 के आर्थिक समीक्षा (Economic Survey) में एक बड़ी सिफारिश की गई है। इसमें कहा गया है कि 'सरकारी कंपनी' की परिभाषा बदली जानी चाहिए।
अभी नियम यह है कि किसी कंपनी को सरकारी कहलाने के लिए उसमें सरकार का हिस्सा कम से कम 51% होना चाहिए। सिफारिश में कहा गया है कि इसे घटाकर 26% किया जा सकता है। अगर यह बदलाव होता है, तो सरकार 51% से भी कम हिस्सा रखकर भी कंपनी को 'सरकारी' बनाए रख सकेगी और बाजार से और ज्यादा पैसा उठा सकेगी।
रेलवे पर सरकार का फोकस
रेलवे हमेशा से सरकार की प्राथमिकता रहा है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय मंत्रालयों में रेलवे को दूसरा सबसे बड़ा बजट मिलता है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए रेलवे मंत्रालय को 2.78 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया गया है।
निवेशकों के लिए क्या है मतलब?
अगर आप निवेशक हैं, तो आपको आने वाले समय में इन कंपनियों के 'ऑफर फॉर सेल' (OFS) पर नजर रखनी चाहिए। अक्सर OFS के दौरान शेयर का भाव मौजूदा बाजार भाव से थोड़ा डिस्काउंट (छूट) पर मिलता है। हालांकि, जब भी बाजार में किसी शेयर की सप्लाई बढ़ती है (जैसे OFS के जरिए), तो उसके भाव में थोड़े समय के लिए दबाव देखने को मिल सकता है।
सरकार का यह कदम साफ बताता है कि वह रेलवे की संपत्तियों का इस्तेमाल कर देश के विकास के लिए फंड जुटाना चाहती है। अगले 4 साल रेलवे पीएसयू (Railway PSUs) के लिए काफी एक्शन वाले रहने वाले हैं। 80,000 करोड़ रुपये का यह लक्ष्य न केवल सरकारी खजाने को भरेगा, बल्कि शेयर बाजार में भी लिक्विडिटी बढ़ाएगा। निवेशकों के लिए यह एक मौका भी हो सकता है और सतर्क रहने का समय भी।
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