India GDP Forecast FY26: FY26 तक GDP में 70% हिस्सेदारी देंगे शहर, छोटे शहरों में छिपी है असली तरक्की की चाबी

MoneySutraHub Team

India GDP Forecast FY26: डन एंड ब्रैडस्ट्रीट की रिपोर्ट का बड़ा दावा- FY26 तक भारत की GDP में शहरों का योगदान 70% होगा। जानिए कैसे टियर 2 और टियर 3 शहर बन रहे हैं विकास के नए इंजन और क्या है सरकार का मास्टर प्लान।




 India GDP Forecast FY26: भारत की अर्थव्यवस्था में एक बहुत बड़ा और बुनियादी बदलाव हो रहा है। कभी गांवों का देश कहा जाने वाला भारत अब तेजी से शहरों के देश में बदल रहा है। यह केवल लोगों के रहने की जगह बदलने की बात नहीं है, बल्कि देश की कमाई यानी जीडीपी (GDP) का गणित भी पूरी तरह बदल रहा है। डेटा और एनालिटिक्स की दुनिया में जानी-मानी कंपनी 'डन एंड ब्रैडस्ट्रीट' (Dun & Bradstreet) की एक ताजा रिपोर्ट ने सभी को चौंका दिया है।


इस रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) तक भारत की कुल जीडीपी में शहरी इलाकों का हिस्सा बढ़कर 70 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। यह आंकड़ा इसलिए भी हैरान करने वाला है क्योंकि 1990 के दशक में यह हिस्सेदारी महज 45 प्रतिशत के आसपास थी। पिछले तीन दशकों में जिस तरह से भारतीय अर्थव्यवस्था ने करवट ली है, उससे यह साफ है कि आने वाले समय में विकास का रास्ता शहरों की गलियों से होकर ही गुजरेगा।


1990 से 2026: एक लंबी छलांग


अगर हम पीछे मुड़कर देखें, तो 90 के दौर में जब उदारीकरण की शुरुआत हुई थी, तब भी भारत की अर्थव्यवस्था में खेती और ग्रामीण क्षेत्रों का बोलबाला था। उस समय शहरों का योगदान आधे से भी कम था। लेकिन, जैसे-जैसे समय बीता, औद्योगीकरण बढ़ा और सर्विस सेक्टर ने रफ्तार पकड़ी, शहरों का महत्व बढ़ता गया।


आज स्थिति यह है कि शहर न केवल रोजगार का केंद्र बन गए हैं, बल्कि देश की संपत्ति का सबसे बड़ा हिस्सा यहीं तैयार हो रहा है। रिपोर्ट बताती है कि यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है, बल्कि यह एक सतत प्रक्रिया का नतीजा है। अब जब हम 70 प्रतिशत के आंकड़े की बात कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि भारत के हर 100 रुपये की कमाई में से 70 रुपये शहरों से आएंगे। यह बदलाव नीति निर्माताओं और निवेशकों के लिए एक बड़ा संकेत है।


2036 तक 60 करोड़ लोग होंगे शहरी


रिपोर्ट में जनसांख्यिकी यानी आबादी के आंकड़ों पर भी विस्तार से बात की गई है। कंपनी का ‘सिटी वाइटैलिटी इंडेक्स’ (CVI), जो 2026 की पहली तिमाही के आंकड़ों पर आधारित है, बताता है कि भारत में शहरीकरण की आंधी चल रही है।


अनुमान लगाया गया है कि साल 2036 तक भारत की शहरी आबादी 60 करोड़ के पार पहुंच जाएगी। आसान भाषा में समझें तो उस समय देश की कुल आबादी का लगभ   40 प्रतिशत हिस्सा शहरों में रह रहा होगा। इसकी तुलना अगर हम 2011 की जनगणना से करें, तो उस समय शहरी आबादी करीब 31 प्रतिशत थी।


लोग गांव छोड़कर शहर क्यों आ रहे हैं? इसका जवाब सीधा है— बेहतर जिंदगी की तलाश। अच्छी नौकरी, बच्चों के लिए बेहतर स्कूल, कॉलेज, और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं लोगों को शहरों की तरफ खींच रही हैं। इसके अलावा, बेहतर सड़कें और 24 घंटे बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं भी इस पलायन का बड़ा कारण हैं।


प्रशासनिक ढांचा भी हो रहा है मजबूत


जैसे-जैसे शहर बढ़ रहे हैं, उन्हें संभालने वाला सिस्टम भी बड़ा हो रहा है। रिपोर्ट में एक बहुत ही महत्वपूर्ण डेटा साझा किया गया है। देश में शहरी स्थानीय निकायों (Urban Local Bodies) की संख्या में भी इजाफा हुआ है।


  • वर्ष 2016: देश में 4,567 शहरी निकाय थे।
  • वर्ष 2025: यह संख्या बढ़कर 4,958 हो गई है।


महज 8 सालों में लगभग 8.5 प्रतिशत की यह बढ़ोतरी बताती है कि सरकार भी इस बात को समझ रही है कि नए बस रहे इलाकों को चलाने के लिए प्रशासनिक ढांचे की जरूरत है। यह नए शहर और कस्बे केवल कंक्रीट के जंगल नहीं हैं, बल्कि यहां एक व्यवस्थित सिस्टम तैयार किया जा रहा है।


टियर 2 और टियर 3 शहर: विकास के नए बाजीगर


इस रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अब विकास केवल दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु तक सीमित नहीं रहा है। 'क्लास वाई' (Class Y) यानी टियर 2 और टियर 3 शहर अब गेम-चेंजर साबित हो रहे हैं।


विशेषज्ञों का कहना है कि मेट्रो शहरों में भीड़भाड़, महंगा जीवन और संसाधनों की कमी के चलते अब बड़ी कंपनियां छोटे शहरों का रुख कर रही हैं। ये छोटे शहर अब 'ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर' (GCC) के रूप में उभर रहे हैं।


इसका फायदा दो तरफा है:


मेट्रो शहरों पर बोझ कम: बड़े शहरों में ट्रैफिक और प्रदूषण का दबाव थोड़ा कम होगा।

स्थानीय रोजगार: छोटे शहरों के युवाओं को नौकरी के लिए अपना घर छोड़कर दूर नहीं जाना पड़ेगा। इससे क्षेत्रीय संतुलन (Regional Balance) बनाने में मदद मिलेगी।


बजट में सरकार का बड़ा दांव


केंद्र सरकार भी इस ट्रेंड को बखूबी समझ रही है। बजट 2026-27 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शहरों के विकास को लेकर बड़ी घोषणाएं की हैं। सरकार का फोकस अब केवल स्मार्ट सिटी बनाने पर नहीं, बल्कि 'सिटी इकोनॉमिक रीजन' तैयार करने पर है।


वित्त मंत्री ने ऐलान किया है कि अगले 5 वर्षों में हर 'सिटी इकोनॉमिक रीजन' को 5,000 करोड़ रुपये तक की मदद दी जाएगी। यह पैसा खासतौर पर टियर-2, टियर-3 शहरों और प्रमुख तीर्थ स्थलों के विकास पर खर्च होगा। सरकार चाहती है कि वाराणसी, उज्जैन, इंदौर या जयपुर जैसे शहर भी आर्थिक रूप से इतने मजबूत हो जाएं कि वे किसी महानगर से कम न लगें।


महानगरों की रेस: कौन है सबसे आगे?


रिपोर्ट में देश के बड़े महानगरों की परफॉरमेंस को भी आंका गया है। विकास की रफ्तार के मामले में गुजरात के अहमदाबाद ने सबको पीछे छोड़ दिया है और पहला स्थान हासिल किया है।


  • पहला स्थान: अहमदाबाद (विकास दर में सबसे तेज)
  • दूसरा और तीसरा: बेंगलुरु और दिल्ली


लेकिन, अगर हम कारोबार शुरू करने यानी 'उद्यम पंजीकरण' की बात करें, तो महाराष्ट्र का पुणे शहर सबसे आगे निकल गया है। पुणे में करीब 6.20 लाख उद्यमों ने अपना रजिस्ट्रेशन कराया है। यह आंकड़ा बताता है कि पुणे अब केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि स्टार्टअप्स और छोटे-बड़े उद्योगों का हब बन चुका है।


क्या है यह 'उद्यम पंजीकरण'?


अक्सर लोग इस शब्द को लेकर उलझन में रहते हैं। आसान शब्दों में कहें तो 'उद्यम पंजीकरण' सरकार का एक ऑनलाइन तरीका है जिससे छोटे और मंझोले कारोबारियों (MSME) को एक पहचान मिलती है।


जब कोई दुकानदार या फैक्ट्री मालिक यह रजिस्ट्रेशन करवाता है, तो उसे सरकार से लोन लेने में आसानी होती है, सब्सिडी मिलती है और टेंडर भरने में छूट मिलती है। पुणे में सबसे ज्यादा रजिस्ट्रेशन होने का मतलब है कि वहां के लोग बिजनेस करने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं और सरकार की योजनाओं का फायदा उठा रहे हैं।


उभरते शहरों (Emerging Cities) की नई कहानी


रिपोर्ट ने उन शहरों की भी लिस्ट जारी की है जो अभी महानगर नहीं बने हैं, लेकिन उस दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं।


उत्तर 24 परगना (पश्चिम बंगाल): उभरते शहरों की लिस्ट में इसे पहला स्थान मिला है। यह कोलकाता के पास का इलाका है जो बहुत तेजी से फैल रहा है।


  • ठाणे (महाराष्ट्र): मुंबई से सटा यह शहर दूसरे नंबर पर है।

  • जयपुर (राजस्थान): पिंक सिटी तीसरे स्थान पर अपनी जगह बनाने में कामयाब रही है।


अगर उभरते शहरों में बिजनेस रजिस्ट्रेशन की बात करें, तो ठाणे ने बाजी मारी है। यहां 4.30 लाख उद्यम पंजीकृत हैं, जो दिखाता है कि मुंबई का बिजनेस अब ठाणे की तरफ शिफ्ट हो रहा है।


सिटी वाइटैलिटी इंडेक्स (CVI) का गणित


डन एंड ब्रैडस्ट्रीट का 'सिटी वाइटैलिटी इंडेक्स' किसी शहर की नब्ज टटोलने का काम करता है। यह इंडेक्स देश के 100 गैर-महानगरीय (Non-Metro) शहरों को उनकी रफ़्तार और आकार के हिसाब से रैंक करता है।


रिपोर्ट एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझाती है: "जरूरी नहीं कि जो शहर बड़ा हो, वह तेजी से तरक्की भी कर रहा हो।"


अगर कोई शहर बहुत बड़ा है लेकिन उसकी ग्रोथ धीमी है, तो इसका मतलब है कि वह शहर 'संतृप्त' (Saturated) हो चुका है। वहां अब और फैलने की गुंजाइश कम है। वहीं, छोटा शहर अगर तेजी से बढ़ रहा है, तो भविष्य उसका है।


आंकड़ों में विरोधाभास: साइज बड़ा पर रफ्तार धीमी


रिपोर्ट में कुछ बहुत ही दिलचस्प उदाहरण दिए गए हैं जो इस थ्योरी को साबित करते हैं:


पुणे: जनसंख्या और फैलाव के मामले में यह बहुत बड़ा है (रैंक 1), लेकिन विकास की रफ्तार में यह 5वें नंबर पर खिसक गया।


ठाणे: आकार में यह नंबर 1 है, लेकिन विकास दर में इसे 290वीं रैंक मिली। इसका मतलब है कि ठाणे अब भर चुका है और वहां ग्रोथ की गति धीमी पड़ गई है।


उत्तर 24 परगना: यह आकार में दूसरे नंबर पर है, लेकिन विकास की रेस में 115वें स्थान पर है।


छोटे मगर दमदार शहर


इसके ठीक उलट, कुछ शहर ऐसे हैं जो आकार में छोटे हैं लेकिन रॉकेट की रफ्तार से भाग रहे हैं:


अहमदाबाद: साइज में यह चौथे नंबर पर आता है, लेकिन ग्रोथ में यह टॉप पर है। यानी यहां अभी भी निवेश और विस्तार की भरपूर संभावनाएं हैं।


मुजफ्फरपुर (बिहार): यह एक चौंकाने वाला नाम है। आकार के मामले में यह 45वें नंबर पर है, लेकिन विकास की रैंकिंग में इसने 24वां स्थान हासिल किया है। यह साबित करता है कि बिहार के छोटे शहर भी अब आर्थिक नक्शे पर अपनी जगह बना रहे हैं।


चुनौतियां और भविष्य की राह


रिपोर्ट और विशेषज्ञों का मानना है कि शहरीकरण की यह रफ्तार भारत के लिए वरदान साबित हो सकती है, बशर्ते हम इसकी चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार रहें।


अगर हम स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स, डिजिटल कनेक्टिविटी और इन्फ्रास्ट्रक्चर को सही समय पर पूरा कर लेते हैं, तो शहरी अर्थव्यवस्था भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने में सबसे बड़ा रोल प्ले करेगी। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है। बढ़ती आबादी के साथ आवास (Housing), ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और पानी-बिजली के प्रबंधन जैसी समस्याएं विकराल रूप ले सकती हैं।


इसलिए, सरकार का फोकस केवल शहरों को बड़ा बनाने पर नहीं, बल्कि उन्हें 'रहने लायक' (Liveable) बनाने पर होना चाहिए।


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कुल मिलाकर, डन एंड ब्रैडस्ट्रीट की यह रिपोर्ट भारत के सुनहरे भविष्य की ओर इशारा करती है। FY26 तक जीडीपी में 70 प्रतिशत योगदान का लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं। टियर 2 और टियर 3 शहरों का उदय यह बताता है कि असली भारत अब केवल गांवों में ही नहीं, बल्कि इन छोटे-छोटे उभरते शहरों में भी बसता है। आने वाले 5 से 10 साल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद रोमांचक होने वाले हैं, जहां मुजफ्फरपुर और उत्तर 24 परगना जैसे शहर विकास की नई इबारत लिखेंगे।

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