चीन में फंसा विदेशी कंपनियों का अरबों डॉलर, निवेश निकालना हुआ मुश्किल, अब भारत और जापान पर टिकी नजरें

MoneySutraHub Team

 China Economy Crisis: चीन की सुस्त अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक तनाव के कारण बड़ी प्राइवेट इक्विटी कंपनियों का अरबों डॉलर वहां फंस गया है। नुकसान से बचने के लिए विदेशी निवेशक अब भारत और जापान का रुख कर रहे हैं।

Foreign Investment China

चीनः दुनिया की बड़ी-बड़ी प्राइवेट इक्विटी (PE) कंपनियों के लिए चीन अब एक ऐसा 'चक्रव्यूह' बन गया है, जहां घुसना तो आसान था, लेकिन बाहर निकलना नामुमकिन सा लग रहा है। एक समय था जब विदेशी निवेशक चीन में पैसा लगाने के लिए बेताब रहते थे, लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।


फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, केकेआर (KKR), ब्लैकस्टोन, CVC कैपिटल और कार्लाइल ग्रुप जैसी दिग्गज कंपनियों ने साल 2025 में चीन से अपने निवेश को पूरी तरह निकालने का एक भी पब्लिक सौदा नहीं किया है। इसका सीधा मतलब है कि इन कंपनियों का अरबों डॉलर चीन में ही अटक कर रह गया है।


आखिर क्यों लग गया है निवेश की वापसी पर ‘ब्रेक'?


प्राइवेट इक्विटी कंपनियों का काम करने का तरीका बहुत सीधा होता है। वे किसी कंपनी को खरीदती हैं, उसकी वैल्यू बढ़ाती हैं और फिर उसे महंगे दाम पर बेचकर (या IPO लाकर) मुनाफा कमाती हैं। लेकिन चीन में अब ये दोनों ही रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं। इसके मुख्य कारण ये हैं:


गिरती अर्थव्यवस्था: चीन की अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ गई है, जिससे कंपनियों की वैल्यूएशन (कीमत) काफी नीचे आ गई है।


भू-राजनीतिक तनाव: अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ चीन के रिश्ते बिगड़े हैं।


सख्त नियम: चीन सरकार के सख्त नियमों के कारण विदेशी निवेशक डरे हुए हैं और वहां नया रिस्क लेने से बच रहे हैं।


ग्लोबल मार्केट में 3.8 ट्रिलियन डॉलर फंसा


यह परेशानी सिर्फ चीन तक सीमित नहीं है। पूरी दुनिया में ब्याज दरें ऊंची हैं, इसलिए कंपनियां अपने एसेट्स सस्ते में नहीं बेचना चाहतीं। पिचबुक के आंकड़ों के अनुसार, 2025 तक दुनिया भर में प्राइवेट इक्विटी फर्म्स के करीब 3.8 ट्रिलियन डॉलर के निवेश ऐसे हैं, जिन्हें वे बेच नहीं पाई हैं। जब ये फर्म्स अपना पैसा नहीं निकाल पातीं, तो वे पेंशन फंड्स और दूसरे निवेशकों को उनका पैसा वापस नहीं लौटा पातीं। इससे मार्केट में नकदी (Liquidity) की भारी कमी हो गई है।


भारी डिस्काउंट पर बिक रही है हिस्सेदारी


जब सीधे तौर पर कंपनी बेचना या IPO लाना मुश्किल हो जाता है, तो निवेशक 'सेकेंडरी मार्केट' का रुख करते हैं। यहां वे अपनी हिस्सेदारी दूसरे निवेशकों को बेचते हैं। लेकिन चीन में यह सौदा भी बहुत घाटे का साबित हो रहा है।


एशिया में प्राइवेट इक्विटी फंड्स औसतन 44% के डिस्काउंट पर बिक रहे हैं। वहीं, चीन से जुड़े फंड्स में तो निवेशकों को 40% से 50% तक की भारी छूट देनी पड़ रही है। इसी मजबूरी के चलते साल 2024 में निवेशकों ने सेकेंडरी मार्केट के जरिए लगभग 162 अरब डॉलर के सौदे किए हैं।


क्या IPO से मिल रही है थोड़ी राहत?


हांगकांग के शेयर बाजार ने निवेशकों को थोड़ी उम्मीद जरूर दी है। 2025 में वहां करीब 35 अरब डॉलर के IPO आए, जिससे कुछ फर्म्स को अपने छोटे निवेश निकालने में मदद मिली। इसके अलावा, इस साल जनवरी में बेन कैपिटल ने अपना डेटा सेंटर ऑपरेटर 'चीनडेटा' 4 अरब डॉलर में बेचा। हालांकि, इसे भी चीनी कंपनियों ने ही खरीदा, जो बताता है कि विदेशी खरीदार अभी भी चीन से दूरी बनाए हुए हैं।


भारत और जापान बने निवेशकों की पहली पसंद


चीन में हो रहे इस नुकसान ने प्राइवेट इक्विटी फर्म्स की आंखें खोल दी हैं। अब वे अपनी रणनीति बदल रहे हैं। चीन से पैसा निकालकर अब भारत और जापान जैसे मजबूत एशियाई बाजारों में लगाया जा रहा है। भारत की तेज आर्थिक ग्रोथ, बेहतर गवर्नेंस और मजबूत शेयर बाजार निवेशकों को भरोसा दे रहा है कि यहां पैसा लगाना और वक्त आने पर मुनाफा लेकर बाहर निकलना, चीन के मुकाबले कहीं ज्यादा सुरक्षित और आसान है।


यह भी पढेंः- Airtel का 20,000 करोड़ का ‘मास्टरस्ट्रोक': अब टेलीकॉम के बाद फाइनेंस सेक्टर में बजेगा डंका!


#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top