क्या फिर छाएगा अंधेरा? कोल इंडिया के उत्पादन में 9.7% की बड़ी गिरावट, रिकॉर्ड बिजली मांग ने बढ़ाई सरकार की टेंशन

Keyur Raval

Indian Energy Sector: भारत में भीषण गर्मी के बीच कोयला संकट (Coal Shortage) का खतरा मंडराने लगा है। कोल इंडिया के उत्पादन में अप्रैल के दौरान 9.7% की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जबकि बिजली की मांग 255.85 GW के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। जानें इस गिरावट का आपके बिजली बिल और सप्लाई पर क्या असर पड़ेगा।


Coal Shortage in India
Coal Shortage in India


नई दिल्ली, 3 मई: भारत में जैसे-जैसे पारा चढ़ रहा है, वैसे-वैसे देश की धड़कनें भी तेज होने लगी हैं। कारण है- बिजली की बढ़ती मांग और कोयले के उत्पादन में आई अचानक गिरावट। देश की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी, कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) ने अप्रैल महीने के जो आंकड़े जारी किए हैं, वे वाकई चिंताजनक हैं। ऐसे समय में जब देश के कोने-कोने से एयर कंडीशनर और कूलरों की गूंज सुनाई दे रही है, कोयले का उत्पादन कम होना किसी बड़े खतरे की घंटी से कम नहीं है।


उत्पादन में 9.7% की बड़ी गिरावट: क्या हैं आंकड़े?


ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, कोल इंडिया का कोयला उत्पादन अप्रैल में 9.7% घटकर 5.61 करोड़ टन रह गया है। यह आंकड़ा इसलिए डराने वाला है क्योंकि पिछले साल इसी महीने (अप्रैल 2025-26 के संदर्भ में) कंपनी ने 6.21 करोड़ टन कोयले का उत्पादन किया था।


उत्पादन में आई यह कमी सीधे तौर पर देश के थर्मल पावर स्टेशनों (Thermal Power Plants) को प्रभावित कर सकती है। आपको बता दें कि भारत में आज भी कुल बिजली उत्पादन का 70% से अधिक हिस्सा कोयले पर ही निर्भर है। अगर खदानों से कोयला पर्याप्त मात्रा में नहीं निकला, तो पावर प्लांट्स में स्टॉक कम हो जाएगा और इसका सीधा असर बिजली की सप्लाई पर पड़ेगा।


बिजली की मांग ने तोड़े सारे रिकॉर्ड


एक तरफ कोयला कम हो रहा है, तो दूसरी तरफ बिजली की भूख बढ़ती जा रही है। सोमवार को देश में बिजली की अधिकतम मांग (Peak Power Demand) 255.85 गीगावाट (GW) के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई। यह अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है। जब मांग अपने चरम पर हो और सप्लाई चेन में कमी आए, तो ग्रिड पर दबाव बढ़ जाता है।


उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि अगर उत्पादन में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले महीनों में उद्योगों और घरेलू उपभोक्ताओं को लोड शेडिंग (Power Cut) का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, घरेलू कोयले की कमी को पूरा करने के लिए सरकार को विदेशों से महंगा कोयला आयात करना पड़ सकता है, जिससे बिजली की दरें भी बढ़ सकती हैं।


कौन सी कंपनियां पिछड़ीं और किन्होंने संभाली कमान?


कोल इंडिया की सभी सहायक कंपनियां एक जैसा प्रदर्शन नहीं कर पाई हैं। CIL द्वारा शेयर बाजार को दी गई जानकारी के अनुसार:


गिरावट दर्ज करने वाली कंपनियां: ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL), भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) और वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) के उत्पादन में कमी आई है।


बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियां: साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECCL) और सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (CCL) ने विपरीत परिस्थितियों में भी उत्पादन में बढ़त बनाए रखी है।


हैरानी की बात यह है कि कोल इंडिया ने अभी तक उत्पादन में आई इस बड़ी गिरावट का कोई ठोस कारण स्पष्ट नहीं किया है। हालांकि, माना जा रहा है कि तकनीकी कारण या लॉजिस्टिक्स से जुड़ी समस्याएं इसकी वजह हो सकती हैं।


भारत की ऊर्जा सुरक्षा में कोल इंडिया का कद


कोल इंडिया सिर्फ एक कंपनी नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ है। देश के कुल घरेलू कोयला उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 80% है। इतना ही नहीं, देश की कुल बिजली उत्पादन में यह अकेले 55% का योगदान देती है और भारत की 40% वाणिज्यिक ऊर्जा जरूरतों को पूरा करती है। ऐसी दिग्गज कंपनी के उत्पादन में लगभग 10% की गिरावट आना पूरी अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी है।


सालाना प्रदर्शन पर भी पड़ा असर


सिर्फ अप्रैल ही नहीं, बल्कि वित्तवर्ष 2025-26 के शुरुआती रुझान भी थोड़े सुस्त रहे हैं। कंपनी का उत्पादन इस दौरान 1.7% घटकर 76.81 करोड़ टन रहा, जबकि पिछले वित्तवर्ष (2024-25) में यह आंकड़ा 78.11 करोड़ टन था। मार्च के महीने में भी उत्पादन पिछले साल के 8.58 करोड़ टन के मुकाबले गिरकर 8.45 करोड़ टन रह गया था।


सरकार का पक्ष और भविष्य की चुनौतियां


सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि घरेलू कोयला उत्पादन मांग के अनुरूप बढ़ रहा है। पश्चिम एशिया (Middle East) में चल रहे तनाव और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच, सरकार ने आश्वासन दिया है कि बिजली की निर्बाध आपूर्ति के लिए हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं। कोल इंडिया को निर्देश दिए गए हैं कि वह सभी क्षेत्रों, विशेषकर पावर सेक्टर को प्राथमिकता के आधार पर कोयला भेजे।


लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अगर उत्पादन में यह गिरावट जारी रही, तो थर्मल पावर प्लांटों पर दबाव बढ़ेगा। उद्योगों को बिजली कटौती का सामना करना पड़ेगा, जिसका असर देश की GDP और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर भी पड़ सकता है।


कोयला उत्पादन में आई यह कमी और बिजली की रिकॉर्ड मांग एक गंभीर स्थिति पैदा कर रही है। भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कोयले पर निर्भरता के साथ-साथ रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) की तरफ भी तेज़ी से कदम बढ़ाने होंगे। फिलहाल, सबकी नज़रें कोल इंडिया के अगले कदमों पर हैं कि वह कैसे इस उत्पादन घाटे की भरपाई करती है ताकि देश को अंधेरे से बचाया जा सके।


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