FD-RD Tax Rules: क्या FD और RD के ब्याज पर अब ज्यादा TDS कटेगा? आयकर विभाग के नए नियमों और सेक्शन 393(1) के बदलावों को विस्तार से समझें। सीनियर सिटीजन और आम निवेशकों के लिए TDS की लिमिट और कैलकुलेशन की पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें।
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| FD-RD Tax Rules |
नई दिल्ली, 2 मईः भारत में निवेश की बात हो और फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) या रिकरिंग डिपॉजिट (RD) का जिक्र न हो, ऐसा मुमकिन नहीं है। सुरक्षित रिटर्न और गारंटीड इनकम के लिए आज भी करोड़ों भारतीय बैंकों में अपनी गाढ़ी कमाई जमा करते हैं। लेकिन हाल ही में आयकर विभाग द्वारा बैंक ब्याज पर TDS (Tax Deducted at Source) को लेकर दिए गए स्पष्टीकरण ने निवेशकों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सोशल मीडिया और खबरों के गलियारों में चर्चा है कि क्या अब FD पर ज्यादा टैक्स देना होगा? क्या नए इनकम टैक्स कानून से आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ेगा? अगर आप भी अपनी जमा पूंजी पर मिलने वाले ब्याज को लेकर चिंतित हैं, तो यह लेख आपके लिए ही है। आइए, बेहद सरल भाषा में समझते हैं कि आखिर पूरा मामला क्या है।
TDS का मूल नियम: कब कटता है टैक्स?
सबसे पहले यह जान लेना जरूरी है कि बैंक आपके ब्याज पर कैंची तभी चलाता है जब आपकी सालाना ब्याज आय एक तय सीमा को पार कर जाती है।
सामान्य नागरिक (60 वर्ष से कम): अगर एक वित्त वर्ष में आपके सभी FD और RD खातों से मिलने वाला कुल ब्याज 40,000 रुपये (कुछ मामलों में 50,000 रुपये तक की छूट) से अधिक है, तो बैंक TDS काटेगा।
वरिष्ठ नागरिक (60 वर्ष या उससे अधिक): बुजुर्गों के लिए यह सीमा काफी राहत भरी है। अगर ब्याज 50,000 रुपये (नए प्रावधानों के तहत 1,00,000 रुपये तक की चर्चा) से अधिक होता है, तभी टैक्स कटता है।
पुराना बनाम नया कानून: भ्रम की असली वजह
अब बात करते हैं उस तकनीकी बदलाव की जिसने भ्रम फैलाया है। अभी तक TDS के नियम Income Tax Act 1961 की धारा 194A के तहत चलते थे। इसमें स्पष्ट था कि बैंकों को एक तय सीमा तक ब्याज पर टैक्स काटने की जरूरत नहीं है।
अब सरकार ‘नए आयकर अधिनियम 2025' की तैयारी में है। इसमें TDS के प्रावधानों को धारा 393(1) में शिफ्ट किया गया है और बैंकिंग कंपनी की परिभाषा धारा 402 में दी गई है।
उलझन कहाँ है?
पुराने कानून में उन बैंकों का स्पष्ट नाम था जो बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के तहत आते थे। नए ड्राफ्ट में शब्दों का हेर-फेर होने से लोगों को लगा कि शायद अब छूट का दायरा बदल जाएगा या बैंकों की लिस्ट छोटी हो जाएगी। लेकिन आयकर विभाग ने साफ किया है कि संस्थाओं का दायरा वही रहेगा। यानी, आपके पसंदीदा बैंक में रखे पैसे पर नियमों में कोई ऐसा बदलाव नहीं हुआ है जिससे आपको डरने की जरूरत हो।
FD-RD पर TDS का पूरा कैलकुलेशन
इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपकी उम्र 35 साल है और आपने एक बैंक में 6,00,000 रुपये की FD कराई है, जिस पर आपको साल का 8% ब्याज (यानी 48,000 रुपये) मिल रहा है।
PAN कार्ड जमा है: बैंक आपकी 48,000 रुपये की आय पर 10% की दर से 4,800 रुपये TDS काट लेगा।
PAN कार्ड जमा नहीं है: अगर आपने बैंक को अपना पैन कार्ड नहीं दिया है, तो बैंक सीधा 20% (यानी 9,600 रुपये) टैक्स काट लेगा।
प्रो टिप: हमेशा बैंक में अपना PAN अपडेट रखें, ताकि आधा टैक्स बचाया जा सके।
RD (रिकरिंग डिपॉजिट) पर भी वही नियम
कई लोगों को लगता है कि RD पर टैक्स नहीं लगता, लेकिन यह गलत है। साल 2015 के बाद से RD पर मिलने वाले ब्याज को भी FD की तरह ही माना जाता है। यानी अगर आपकी RD का सालाना ब्याज भी लिमिट क्रॉस करता है, तो बैंक उस पर भी TDS काटेगा।
सीनियर सिटीजन के लिए बड़ी राहत
वरिष्ठ नागरिकों के लिए सरकार ने हमेशा से नरम रुख अपनाया है। अगर किसी बुजुर्ग की सालाना ब्याज आय 1,00,000 रुपये तक रहती है, तो उन्हें नए नियमों के तहत टैक्स कटौती से राहत मिलने की उम्मीद है। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि रिटायरमेंट के बाद ब्याज पर निर्भर रहने वाले लोगों के पास खर्च के लिए पर्याप्त पैसा रहे।
TDS कटने से कैसे बचाएं? (Form 15G और 15H)
अगर आपकी कुल सालाना आय (ब्याज मिलाकर) टैक्स छूट की सीमा (जैसे 2.5 लाख या 3 लाख रुपये) से कम है, लेकिन बैंक फिर भी TDS काट रहा है, तो आप इसे रोक सकते हैं:
Form 15G: 60 साल से कम उम्र के लोग इसे भरकर बैंक में जमा करें।
Form 15H: वरिष्ठ नागरिक इस फॉर्म का इस्तेमाल करें।
ये फॉर्म बैंक को यह घोषणा देते हैं कि आपकी कुल आय पर कोई टैक्स नहीं बनता, इसलिए बैंक ब्याज पर TDS न काटे।
संक्षेप में कहें तो, आयकर विभाग के स्पष्टीकरण का उद्देश्य नियमों को सरल बनाना है, न कि निवेशकों पर बोझ डालना। नए कानून (2025) में परिभाषाएं जरूर बदली हैं, लेकिन बैंक ब्याज पर TDS का मूल ढांचा वैसा ही है। अगर आप जागरूक हैं और समय पर अपना PAN और फॉर्म 15G/15H जमा करते हैं, तो आपको घबराने की कोई जरूरत नहीं है। अपने निवेश को सुरक्षित रखें और टैक्स के नियमों को समझकर सही वित्तीय फैसले लें।
