Gold - Silver Price Drop: पश्चिम एशिया युद्ध के बावजूद सोने-चांदी की कीमतों में भारी गिरावट क्यों आई? डॉलर की मजबूती और महंगाई ने कैसे बिगाड़ा खेल, जानिए इस क्रैश की पूरी इनसाइड स्टोरी।
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| Gold - Silver Price Drop |
नई दिल्ली, 7 अप्रैल: जब भी दुनिया के किसी कोने में युद्ध के बादल मंडराते हैं या कोई बड़ी अनिश्चितता आती है, तो शेयर बाजार सहम जाते हैं। ऐसे घबराहट वाले माहौल में निवेशक अपना पैसा निकालकर सबसे सुरक्षित जगह यानी 'सोने-चांदी' में लगाते हैं। इसे वित्तीय बाजार की भाषा में 'सेफ हेवन' (सुरक्षित ठिकाना) कहा जाता है। लेकिन, इस बार पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच भड़के संघर्ष ने बाजार के इस बरसों पुराने नियम को पलट कर रख दिया है।
इस भयंकर युद्ध के बीच कीमती धातुओं के दाम आसमान छूने के बजाय धड़ाम से नीचे गिर रहे हैं। सोने और चांदी की इस उल्टी चाल ने दुनियाभर के निवेशकों और मार्केट एक्सपर्ट्स को पूरी तरह से चौंका दिया है।
शुरुआती तेजी के बाद 22% तक का भारी क्रैश
आंकड़ों पर नजर डालें तो पश्चिम एशिया में जब तनाव शुरू हुआ था, तब शुरुआती कुछ दिनों में सोने और चांदी में थोड़ी बहुत चमक देखने को मिली थी। निवेशकों को लगा कि अब दाम रॉकेट की तरह ऊपर जाएंगे। लेकिन, उम्मीदों के बिल्कुल उलट, यह तेजी चंद दिनों में ही हवा हो गई।
एक्सिस सिक्योरिटीज के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, इस संघर्ष के बाद से सोने की कीमतों में 10 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आ चुकी है। वहीं चांदी का हाल तो और भी बुरा है, इसमें 22 प्रतिशत से अधिक की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
2025 और 2026 के रिकॉर्ड हाई से हुई तुलना
आज की इस गिरावट को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे मुड़कर देखना होगा। साल 2025 में सोना और चांदी दोनों ही धातुओं ने निवेशकों को छप्पर फाड़ रिटर्न दिया था। उस वक्त इन दोनों ने दुनिया के तमाम बड़े एसेट क्लास (जैसे प्रॉपर्टी, शेयर बाजार, क्रिप्टो) को पीछे छोड़ दिया था। 2025 में चांदी में 165 फीसदी से ज्यादा की तूफानी बढ़त देखी गई थी, जबकि सोना 75 फीसदी से ज्यादा उछला था।
यह बंपर तेजी 2026 की शुरुआत तक जारी रही। जनवरी के अंत में आलम यह था कि सोना 5500 डॉलर प्रति औंस के अपने ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। वहीं चांदी भी 121 डॉलर प्रति औंस तक जा पहुंची थी। विश्लेषकों का मानना था कि 2025 में यह शानदार प्रदर्शन इस बात का साफ इशारा था कि बड़े निवेशक और दुनियाभर के केंद्रीय बैंक (सेंट्रल बैंक्स) अपने पोर्टफोलियो में सोने को जमकर भर रहे थे। लेकिन पश्चिम एशिया के युद्ध ने पूरी तस्वीर ही बदलकर रख दी।
आखिर क्यों औंधे मुंह गिरे दाम?
आखिर ऐसा क्या हुआ कि ‘सेफ हेवन' माने जाने वाले सोना-चांदी से निवेशकों का मोहभंग हो गया? इसके पीछे कई बड़े आर्थिक और भू-राजनीतिक कारण काम कर रहे हैं:
1. मजबूत अमेरिकी डॉलर और महंगाई का डर
एक्सिस सिक्योरिटीज के कमोडिटी मामलों के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट देवया गागलानी ने इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह 'अमेरिकी डॉलर की मजबूती' को बताया है। उन्होंने समझाया कि अमेरिका ने ईरान की ताकत और उसकी प्रतिक्रिया का गलत आकलन किया था। जब ईरान ने जवाबी कार्रवाई की और होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद कर दिया, तो कच्चे तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह टूट गई।
कच्चा तेल महंगा होने से दुनिया भर में महंगाई बढ़ने का डर पैदा हो गया। जब महंगाई बढ़ती है, तो अमेरिकी केंद्रीय बैंक 'फेडरल रिजर्व' ब्याज दरों में कटौती नहीं करता। इस साल भी फेड रिजर्व द्वारा ब्याज दरें घटाने की उम्मीदें टूट गईं। इससे अमेरिकी डॉलर बेहद मजबूत हो गया और जब डॉलर मजबूत होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने-चांदी की कीमतें अपने आप दबाव में आ जाती हैं।
2. बॉन्ड यील्ड का बढ़ना
जब भू-राजनीतिक संकट गहराता है, तो निवेशक केवल सोने की तरफ नहीं भागते। वे अमेरिकी सरकारी बॉन्ड और डॉलर को भी बेहद सुरक्षित मानते हैं। कावेरी मोरे, जो ज्वॉइस ब्रोकिंग में कमोडिटी एनालिस्ट हैं, बताती हैं कि जब बॉन्ड पर रिटर्न (यील्ड) ज्यादा मिलता है, तो निवेशक कीमती धातुओं से पैसा निकाल लेते हैं। क्योंकि सोना घर में या लॉकर में रखने पर कोई फिक्स ब्याज (Interest) नहीं देता, जबकि अमेरिकी बॉन्ड में निवेश करने पर तय समय पर पक्का ब्याज मिलता है।
3. चांदी की औद्योगिक मांग (Industrial Demand) में भारी कमी
चांदी केवल एक निवेश का जरिया नहीं है, बल्कि यह एक बेहद जरूरी ‘औद्योगिक धातु' (Industrial Metal) भी है। दुनिया भर की कुल चांदी की मांग का लगभग 60 फीसदी हिस्सा सीधे तौर पर कारखानों और उद्योगों से आता है। इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक ऑटोमोबाइल और सेमीकंडक्टर बनाने में होता है।
जब युद्ध लंबा खिंचता है, तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो जाती है। कंपनियां अपना नया निवेश रोक देती हैं और फैक्ट्रियों में उत्पादन धीमा पड़ जाता है। मैन्युफैक्चरिंग घटने से चांदी की मांग अचानक से गिर जाती है और इसी वजह से चांदी सोने के मुकाबले ज्यादा (35 प्रतिशत तक) टूटी है।
4. केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की बिक्री
एचडीएफसी सिक्योरिटीज के सीनियर एनालिस्ट सौमिल गांधी ने एक और बड़ा कारण बताया। उन्होंने कहा कि रूस और तुर्किये जैसे देशों की अर्थव्यवस्था पर भी युद्ध और प्रतिबंधों का असर पड़ा है। इन देशों के केंद्रीय बैंकों ने अपनी स्थानीय मुद्रा (Currency) को डूबने से बचाने के लिए और उसे स्थिर रखने के लिए अपने खजाने से बड़ी मात्रा में सोना बेचना शुरू कर दिया। बाजार में अचानक सोने की सप्लाई बढ़ने से भी इसके दाम गिर गए।
ऊंचाई से कितना नीचे आ चुके हैं दाम?
ताजा आंकड़ों की बात करें तो, 6 अप्रैल तक सोने की कीमतें अपने लाइफटाइम हाई से 16 फीसदी से ज्यादा गिरकर लगभग 4680 डॉलर प्रति औंस पर आ गई हैं। चांदी की हालत और भी खराब है। यह अपने उच्चतम स्तर से 35 प्रतिशत से ज्यादा टूटकर करीब 74 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई है। जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के रिसर्च प्रमुख हरीश वी के अनुसार, अब शॉर्ट टर्म के व्यापारी घबराहट में अपनी पोजीशन काट रहे हैं, जिससे 'मजबूर बिक्री' (Panic Selling) का माहौल बन गया है।
इतिहास भी देता है गवाही
ऐतिहासिक आंकड़े भी यही बताते हैं कि युद्ध के समय सोना हमेशा नहीं चमकता।
रूस-यूक्रेन युद्ध (फरवरी 2022): जब यह हमला हुआ था, तो पहले हफ्ते सोने में 4 फीसदी और चांदी में 6 फीसदी का उछाल आया था, लेकिन युद्ध लंबा खिंचने पर यह तेजी खत्म हो गई और दाम नीचे आ गए।
भारत-पाकिस्तान संघर्ष (2025): यह संघर्ष बहुत कम समय का था। इससे ग्लोबल सप्लाई या तेल बाजार पर कोई असर नहीं पड़ा, इसलिए तब सोने-चांदी के दाम लगभग स्थिर रहे थे।
कुल मिलाकर, बाजार अब केवल भावनाओं पर नहीं बल्कि ठोस आर्थिक गणित पर चल रहा है। जब तक अमेरिकी फेडरल रिजर्व अपनी मौद्रिक नीतियों में ढील नहीं देता, ब्याज दरें कम नहीं होतीं और महंगाई काबू में नहीं आती, तब तक सोने और चांदी में दोबारा वैसी बंपर तेजी लौटने की संभावना काफी कम है। फिलहाल, भू-राजनीतिक टेंशन से ज्यादा हावी डॉलर और बॉन्ड मार्केट का गणित है।
पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध के बीच सोने और चांदी की कीमतों ने निवेशकों को तगड़ा झटका दिया है। आमतौर पर वैश्विक संकट के समय सोना-चांदी को सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन इस बार उल्टी चाल देखने को मिली है। शुरुआती तेजी के बाद सोने में 10 प्रतिशत और चांदी में 22 प्रतिशत से अधिक की भारी गिरावट आ चुकी है।
साल 2025 और 2026 की शुरुआत में रिकॉर्ड तोड़ रिटर्न देने वाली ये धातुएं आज औंधे मुंह गिर रही हैं। इस गिरावट का मुख्य कारण युद्ध के कारण कच्चा तेल महंगा होना, महंगाई बढ़ना और अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना है। इसके अलावा ऊंची बॉन्ड यील्ड और वैश्विक स्तर पर औद्योगिक गतिविधियों के धीमे पड़ने से चांदी की मांग घटी है। जब तक वैश्विक महंगाई और ब्याज दरें कम नहीं होतीं, तब तक इन कीमती धातुओं में बड़ी तेजी की उम्मीद कम है।
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