Tata Trust Row: देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने ‘टाटा' से जुड़े एक अहम ट्रस्ट में एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। रतन टाटा के करीबी रहे मेहली मिस्त्री ने टाटा के एलाइड ट्रस्ट (BHJTNCI) के दो दिग्गज ट्रस्टियों टीवीएस मोटर के चेयरमैन एमेरिटस वेणु श्रीनिवासन और पूर्व आईएएस विजय सिंह की नियुक्ति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मिस्त्री ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के पास शिकायत दर्ज कराते हुए कहा है कि 1923 के ट्रस्ट डीड के अनुसार ट्रस्टी का 'पारसी' होना और 'मुंबई का स्थायी निवासी' होना अनिवार्य है। ये दोनों ही दिग्गज इन शर्तों को पूरा नहीं करते। इस लेख में जानें कि कैसे 103 साल पुराना एक नियम आज के आधुनिक कॉरपोरेट ढांचे को चुनौती दे रहा है और आगे टाटा ट्रस्ट में क्या बड़े बदलाव हो सकते हैं।
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| Tata Group Controversy |
नई दिल्ली, 5 अप्रैल: जब भी बात भरोसा, ईमानदारी और समाज सेवा की आती है, तो भारत में सबसे पहला नाम ‘टाटा' (Tata) का आता है। लेकिन अब इसी भरोसे के प्रतीक 'टाटा ट्रस्ट' के अंदर से एक ऐसी खबर आ रही है, जिसने पूरे कॉरपोरेट जगत में हलचल मचा दी है। यह विवाद पैसों का नहीं, बल्कि ‘विरासत' और ‘नियमों' का है।
टाटा समूह के पूर्व चेयरमैन दिवंगत रतन टाटा के बेहद करीबी रहे मेहली मिस्त्री ने एक बड़ा कानूनी मोर्चा खोल दिया है। यह मोर्चा सीधा टाटा के एक एलाइड ट्रस्ट (सहयोगी ट्रस्ट) के दो सबसे बड़े और दिग्गज चेहरों की कुर्सी पर निशाना साध रहा है। ये दो नाम हैं टीवीएस मोटर के चेयरमैन एमेरिटस वेणु श्रीनिवासन और पूर्व आईएएस अधिकारी विजय सिंह।
मामला इतना गंभीर है कि इसकी शिकायत सीधे महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के पास पहुंच गई है। आरोप है कि इन दोनों दिग्गजों की नियुक्ति शुरुआत से ही गलत है और कानून की नजर में यह 'शून्य' (Zero) है। आइए इस पूरे विवाद को, इसके पीछे के 103 साल पुराने नियमों को और इसके भविष्य के असर को बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं।
टाटा ट्रस्ट और सहयोगी ट्रस्ट का ढांचा
इस विवाद को समझने से पहले हमें यह समझना होगा कि टाटा ट्रस्ट काम कैसे करता है।
सरल भाषा में कहें तो ‘टाटा ट्रस्ट्स' (Tata Trusts) एक बहुत बड़ी ‘छतरी' (Umbrella) की तरह है। इस छतरी के नीचे देश की भलाई के लिए काम करने वाले कई अलग-अलग ट्रस्ट आते हैं। मुख्य रूप से इसमें दो बड़े ट्रस्ट शामिल हैं ‘सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट' और ‘सर रतन टाटा ट्रस्ट'।
इसी ‘सर रतन टाटा ट्रस्ट' की छतरी के नीचे एक सहयोगी (Allied) ट्रस्ट काम करता है, जिसका नाम है ‘बाई हीराबाई जमशेदजी टाटा नवसारी चैरिटेबल इंस्टीट्यूशन' (BHJTNCI)। इस ट्रस्ट की स्थापना आज से 103 साल पहले यानी 1923 में सर रतन टाटा की वसीयत के आधार पर की गई थी। इस ट्रस्ट का मुख्य काम गुजरात के नवसारी में पारसी समुदाय के लोगों को शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में मदद करना है। विवाद इसी BHJTNCI ट्रस्ट के बोर्ड सदस्यों को लेकर शुरू हुआ है।
5 पॉइंट में समझें पूरा मामला
मेहली मिस्त्री, जो एम पल्लोनजी ग्रुप (M Pallonji Group) के प्रमोटर हैं और जिनका टाटा परिवार के साथ दशकों पुराना रिश्ता है, उन्होंने इस ट्रस्ट के नियमों का हवाला देते हुए बड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। चलिए इसे 5 आसान बिंदुओं में समझते हैं:
1. विवाद की असली जड़: 103 साल पुराना ट्रस्ट डीड
मेहली मिस्त्री ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर को दी गई अपनी शिकायत में 1923 के उस मूल दस्तावेज (Trust Deed) का हवाला दिया है, जिसके आधार पर यह ट्रस्ट बना था। मिस्त्री का कहना है कि वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह इस ट्रस्ट के ट्रस्टी बनने की बुनियादी योग्यता ही नहीं रखते। डीड की धारा 6 और 18 में साफ लिखा है कि अगर कोई ट्रस्टी निर्धारित शर्तों को पूरा नहीं करता है, तो उसे कानूनी भाषा में 'डीम्ड डेड' (Deemed Dead) यानी 'मृत मान लिया गया' समझा जाना चाहिए।
2. ट्रस्टी बनने की 2 सख्त शर्तें क्या हैं?
1923 के डीड के अनुसार, इस ट्रस्ट के बोर्ड में शामिल होने के लिए दो शर्तें पूरी करना अनिवार्य है:
व्यक्ति का 'पारसी जोरोस्ट्रियन' (Parsi Zoroastrian) धर्म का होना जरूरी है।
व्यक्ति का 'मुंबई में स्थायी निवास' (Permanent Residence in Mumbai) होना जरूरी है।
मिस्त्री का सीधा तर्क है कि श्रीनिवासन और विजय सिंह न तो पारसी समुदाय से आते हैं और न ही मुंबई के स्थायी निवासी हैं। इसलिए, उन्हें पद पर बिठाना पूरी तरह से नियमों का उल्लंघन है।
3. धोखाधड़ी और विश्वासघात का गंभीर आरोप
मामला सिर्फ योग्यता तक नहीं रुका है। मेहली मिस्त्री ने अपनी शिकायत में इसे कानूनी रूप से बहुत गंभीर बना दिया है। उन्होंने कहा है कि इन दोनों का पदों पर बने रहना 'भारतीय न्याय संहिता' (BNS) 2024 और 'महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट' 1950 के तहत सीधे तौर पर धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक विश्वासघात का मामला बनता है। मिस्त्री ने चैरिटी कमिश्नर से मांग की है कि इन दोनों ट्रस्टियों से एक हलफनामा (Affidavit) मांगा जाए, जिसमें वे खुद अपनी योग्यता और धर्म को साबित करें।
4. ट्रस्ट का मौजूदा बोर्ड स्ट्रक्चर
1923 से समाज सेवा कर रहे 'बाई हीराबाई ट्रस्ट' (BHJTNCI) के मौजूदा बोर्ड में 6 बड़े नाम शामिल हैं:
- नोएल टाटा (अध्यक्ष - Chairman)
- वेणु श्रीनिवासन (उपाध्यक्ष - जिन पर आपत्ति है)
- विजय सिंह (उपाध्यक्ष - जिन पर आपत्ति है)
- जिमी एन टाटा (सदस्य)
- दारियस खंबाटा (सदस्य)
- जहांगीर एचसी जहांगीर (सदस्य)
5. मेहली मिस्त्री की मंशा क्या है?
अक्सर जब कॉरपोरेट जगत में ऐसे विवाद होते हैं, तो लोग सोचते हैं कि शिकायत करने वाला अपनी कुर्सी वापस पाना चाहता है। लेकिन मेहली मिस्त्री ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है, "मैं अपनी कोई बहाली नहीं चाहता। मेरा एकमात्र मकसद रतन टाटा की महान विरासत, ट्रस्ट के संस्थापक की मूल वसीयत और पारसी समुदाय के हितों की रक्षा करना है।" ध्यान देने वाली बात यह है कि मिस्त्री ने खुद विवादों से दूर रहने के लिए कुछ समय पहले टाटा ट्रस्ट के अपने पदों से गरिमापूर्ण तरीके से इस्तीफा दे दिया था।
महत्वपूर्ण तथ्य
- ट्रस्ट का नाम: बाई हीराबाई जमशेदजी टाटा नवसारी चैरिटेबल इंस्टीट्यूशन (BHJTNCI)।
- स्थापना का वर्ष: 1923 (103 साल पहले)।
- शिकायतकर्ता: मेहली मिस्त्री (रतन टाटा के करीबी और एम पल्लोनजी ग्रुप के प्रमोटर)।
- आरोप किन पर: वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह।
- कानूनी आधार: ट्रस्ट डीड की धारा 6 और 18, BNS 2024, महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट 1950।
- मौजूदा चेयरमैन: नोएल टाटा।
विरासत बनाम आधुनिक कॉरपोरेट गवर्नेंस
यह मामला सिर्फ दो लोगों की कुर्सी जाने का नहीं है। यह मामला 'परंपरा' और 'आधुनिक कॉरपोरेट गवर्नेंस' के बीच टकराव का है। एक तरफ 1923 की वसीयत है, जो साफ कहती है कि ट्रस्टी पारसी होना चाहिए। पुराने समय में ऐसे नियम इसलिए बनाए जाते थे ताकि उस समुदाय विशेष की संस्कृति और भलाई के काम उसी समुदाय के लोग करें।
दूसरी तरफ आज का समय है। वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह कोई साधारण नाम नहीं हैं। श्रीनिवासन ने टीवीएस मोटर को ग्लोबल ब्रांड बनाया है, वहीं विजय सिंह सरकार के शीर्ष पदों पर रहे हैं। टाटा ट्रस्ट ने शायद इन दिग्गजों को इनके 'धर्म' के आधार पर नहीं, बल्कि इनके 'अनुभव' और 'प्रबंधन कौशल' के आधार पर नियुक्त किया होगा। लेकिन कानून और वसीयत भावनाएं नहीं देखते, वे लिखे हुए शब्द देखते हैं। यही वजह है कि यह मामला कानूनी रूप से बहुत मजबूत माना जा रहा है।
बाजार और कॉरपोरेट जगत की प्रतिक्रिया
टाटा ग्रुप आमतौर पर अपने अंदरूनी मामलों को बंद कमरों में सुलझाने के लिए जाना जाता है। रतन टाटा के निधन के बाद टाटा ट्रस्ट्स की कमान नोएल टाटा के हाथों में है। ऐसे में अचानक से एक पुराने ट्रस्ट डीड को लेकर विवाद सामने आना कॉरपोरेट गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
हालांकि, इस विवाद का टाटा मोटर्स, टीसीएस (TCS) या टाटा स्टील जैसी कंपनियों के शेयर बाजार पर सीधा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि यह मामला एक परोपकारी ट्रस्ट का है। लेकिन, 'टाटा की छवि' के नजरिए से लोग इस खबर पर करीब से नजर बनाए हुए हैं।
आगे क्या होगा?
अब सबकी निगाहें महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर पर टिकी हैं। अगर कमिश्नर मेहली मिस्त्री की मांग पर 'सुओ मोटो' (स्वत: संज्ञान - Suo Moto) लेते हैं, तो इसके बड़े परिणाम हो सकते हैं:
हलफनामा: वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह को कानूनी प्रक्रिया से गुजरते हुए अपनी योग्यता साबित करने के लिए हलफनामा देना पड़ सकता है।
कुर्सी पर खतरा: अगर वे 1923 के नियमों को पार नहीं कर पाते, तो उन्हें कानूनी रूप से ट्रस्ट के बोर्ड से हटना पड़ सकता है।
नियमों में बदलाव की अपील: ऐसा भी हो सकता है कि टाटा ट्रस्ट कोर्ट का दरवाजा खटखटाए और अपील करे कि 100 साल पुराने नियमों को आज के समय के हिसाब से बदला जाए।
टाटा ट्रस्ट का यह विवाद एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है कि क्या 100 साल पुरानी वसीयतों को आज के बदलते कॉरपोरेट स्ट्रक्चर में जस का तस लागू किया जा सकता है? मेहली मिस्त्री ने पारसी विरासत और रतन टाटा के उसूलों की ढाल बनाकर जो कानूनी तीर छोड़ा है, उसने टाटा ट्रस्ट के प्रबंधन को सोचने पर मजबूर कर दिया है। फिलहाल वेणु श्रीनिवासन, विजय सिंह या टाटा ट्रस्ट की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि 2024-25 के इस आधुनिक दौर में, 1923 का नियम किसकी कुर्सी बचाता है और किसकी कुर्सी गिराता है।
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