Crude Oil Price Hike: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। जानिए इस वैश्विक संकट का भारत की अर्थव्यवस्था और आपकी जेब पर क्या असर पड़ेगा।
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| Crude Oil Price Hike |
नई दिल्ली, 30 अप्रैलः दुनियाभर के शेयर बाजारों और आम आदमी की रसोई तक तेल की कीमतों का सीधा असर पहुंचता है। हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने ग्लोबल मार्केट में एक नई हलचल पैदा कर दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त चेतावनी के बाद कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छू रही हैं। ब्रेंट क्रूड का भाव 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है, जो कि 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद का सबसे उच्चतम स्तर है।
क्यों भड़का है तेल का बाजार? इस संकट के पीछे सबसे बड़ा कारण ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (Strait of Hormuz) को लेकर जारी विवाद है। दुनिया का लगभग 20% तेल और गैस इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी (Blockade) करने के कड़े आदेश दिए हैं। ट्रंप का स्पष्ट संदेश है कि जब तक ईरान परमाणु समझौते पर ईमानदारी से बातचीत नहीं करता और अपने कार्यक्रम को नहीं रोकता, तब तक यह दबाव जारी रहेगा।
क्या हैं ताजा आंकड़े?
Brent Crude: 120 डॉलर प्रति बैरल के पार (4 साल के उच्चतम स्तर पर)।
WTI Crude: 108 डॉलर प्रति बैरल के आसपास स्थिर।
मुद्रास्फीति (Inflation): मार्च में महंगाई दर 3.5% तक पहुंची।
फेडरल रिजर्व की दरें: 3.5% से 3.75% के बीच बरकरार।
फेडरल रिजर्व के सामने दोहरी चुनौती अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल भी इस स्थिति को लेकर चिंतित हैं। उनके सामने दो बड़ी समस्याएं हैं: एक तरफ बढ़ती महंगाई और दूसरी तरफ सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था। पॉवेल ने स्वीकार किया है कि तेल की कीमतों में उछाल सीधे तौर पर आम नागरिक की खर्च करने की क्षमता (Purchasing Power) को कम कर रहा है। जब ईंधन महंगा होता है, तो बाकी आवश्यक वस्तुओं के दाम भी बढ़ जाते हैं, जिससे महंगाई और अधिक बेकाबू होने लगती है।
भारत के लिए खतरे की घंटी भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर भारत के ‘व्यापार घाटे' (Trade Deficit) पर पड़ता है।
घरेलू महंगाई: पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट महंगा हो जाता है, जिससे खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ना तय है।
रुपये पर दबाव: डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत गिरने की संभावना बढ़ जाती है क्योंकि तेल खरीदने के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है।
आर्थिक विकास: तेल की ऊंची कीमतें कंपनियों के मुनाफे को कम करती हैं, जिससे बाजार में सुस्ती आ सकती है।
फिलहाल दुनिया ‘वेट एंड वॉच' की स्थिति में है। अगर अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक समाधान नहीं निकलता है, तो कच्चे तेल की ये आग और भड़क सकती है। भारत जैसे देशों के लिए यह समय काफी संवेदनशील है और आने वाले महीनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों के साथ-साथ महंगाई पर भी इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है।

