युद्ध से दुनिया में तेल का हाहाकार, लेकिन ड्रैगन कैसे है तैयार? चीन की इस ‘सीक्रेट' रणनीति से भारत ले सकता है बड़े सबक

MoneySutraHub Team

China Energy Strategy: पश्चिम एशिया युद्ध से ग्लोबल ऊर्जा संकट के बीच चीन बिल्कुल सुरक्षित है। जानिए कैसे ड्रैगन ने सालों पहले की थी तैयारी और क्या हैं भारत के लिए सबक। 


Global Oil Crisis



नई दिल्ली, 6 अप्रैलः पश्चिम एशिया (Middle East) में चल रहे युद्ध ने पूरी दुनिया की टेंशन बढ़ा दी है। दुनिया एक बड़े ऊर्जा संकट का सामना कर रही है। लेकिन इन सबके बीच दुनिया का सबसे बड़ा तेल खरीदार, यानी चीन एकदम शांत है। न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) की एक ताज़ा रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि चीन सालों से इस तरह के हालातों से निपटने की गुपचुप तैयारी कर रहा था।


इमरजेंसी के लिए जमा कर लिया था कच्चा तेल


युद्ध की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे अहम समुद्री रास्तों पर सप्लाई चेन टूट रही है, जिससे एशियाई देशों में तेल का संकट गहरा गया है। लेकिन चीन ने 2004 में ही अपने लिए इमरजेंसी तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) बनाना शुरू कर दिया था। उसने सस्ते दामों पर इतना कच्चा तेल स्टोर कर लिया है कि मौजूदा झटकों का उस पर कोई खास असर नहीं हो रहा है।


EV और ग्रीन एनर्जी पर चीन का बड़ा दांव


ड्रैगन ने तेल पर अपनी निर्भरता खत्म करने के लिए एक लंबी गेम खेली। कभी पेट्रोल-डीजल कारों का सबसे बड़ा खरीदार रहा चीन आज इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) के मामले में दुनिया का नंबर 1 बाजार बन चुका है। इससे वहां तेल की मांग तेजी से घटी है। साथ ही, उसने अपनी सुरक्षा के लिए सौर (Solar), पवन (Wind) और जल ऊर्जा में अंधाधुंध पैसा लगाया है।


कोयले से केमिकल: जर्मनी की पुरानी तकनीक का इस्तेमाल


रिपोर्ट का सबसे हैरान करने वाला पहलू चीन का ‘कोयला प्लान’ है। द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी ने कच्चे तेल की कमी होने पर कोयले से केमिकल बनाने की तकनीक निकाली थी। चीन ने इसी तकनीक को अब बहुत बड़े पैमाने पर अपना लिया है। 2020 में जहां चीन ने 155 मिलियन टन कोयले का इस्तेमाल केमिकल बनाने में किया था, वहीं 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 276 मिलियन टन हो गया। 2025 तक इसमें 15 प्रतिशत और बढ़ोतरी की उम्मीद है।


विदेशी कंपनियों की छुट्टी, खुद बना ‘बॉस’


पहले चीन को ज़रूरी केमिकल्स के लिए DuPont, Shell और BASF जैसी बड़ी विदेशी कंपनियों के आगे हाथ फैलाना पड़ता था। लेकिन अब चीन खुद इनका बड़ा सप्लायर बन गया है। आज हालात यह हैं कि दुनिया का करीब 75 प्रतिशत पॉलिएस्टर और नायलॉन सिर्फ चीन में बनता है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में जब 'ट्रेड वॉर' शुरू हुआ था, तब घबराए चीन ने अपनी इस आत्मनिर्भरता की रणनीति को और भी तेज कर दिया था।


भारत के लिए क्या हैं सबक?


जब वियतनाम और फिलीपींस जैसे एशियाई देशों में बिजली और ऊर्जा का संकट आया, तो उन्होंने चीन से मदद मांगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया के दाम 40 प्रतिशत तक बढ़ गए, लेकिन चीन में कोयले से बनने वाले उर्वरक के दाम बिल्कुल कंट्रोल में रहे।


भले ही चीन आज भी अपनी जरूरत का 75 प्रतिशत तेल खरीदता हो, लेकिन उसने अपने विकल्प इतने मजबूत कर लिए हैं कि कोई उसे ब्लैकमेल नहीं कर सकता। भारत जैसे तेजी से बढ़ते देशों के लिए यह एक बहुत बड़ा सबक है। अगर देश में ग्रीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और घरेलू कच्चे माल पर फोकस बढ़ाया जाए, तो भविष्य में होने वाले किसी भी वैश्विक युद्ध या संकट से हमारी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सकता है।


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