Rupee vs Dollar: डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 92 के पार पहुंच गया है। ईरान संकट, कच्चे तेल में उछाल और विदेशी निवेशकों की भारी निकासी से यह ऐतिहासिक गिरावट आई है। पढ़ें पूरी खबर।
नई दिल्लीः भारतीय मुद्रा के इतिहास में बुधवार, 4 मार्च का दिन एक बड़ी गिरावट लेकर आया। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया पहली बार 92 के स्तर को पार कर गया। बाजार खुलते ही रुपया 55 पैसे टूटकर 92.02 डॉलर पर आ गया। इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट में बढ़ा तनाव है। ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों की वजह से कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतों में भयंकर उछाल आया है और यह 82 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है।
इसके अलावा विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से अपना पैसा तेजी से निकाला है। सोमवार को ही विदेशी निवेशकों ने 350 मिलियन डॉलर से ज्यादा की निकासी की। एक्सपर्ट्स का मानना है कि तेल महंगा होने से भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ेगा, जिससे महंगाई और बढ़ सकती है। सेफ-हेवन के तौर पर डॉलर की डिमांड लगातार रुपये को कमजोर कर रही है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार से भारत के लिए एक बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। बुधवार 4 मार्च को ट्रेड की शुरुआत में ही रुपया 55 पैसे टूट गया और इतिहास में पहली बार 92 रुपये प्रति डॉलर के आंकड़े को पार कर गया।
मंगलवार को बाजार छुट्टी के कारण बंद थे, जबकि सोमवार 2 मार्च को रुपया 91.47 के स्तर पर बंद हुआ था। इससे पहले जनवरी के महीने में रुपये ने 91.9875 का अपना सबसे निचला स्तर छुआ था। लेकिन अब 92.02 के नए रिकॉर्ड लो (Record Low) ने अर्थशास्त्रियों और निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर रुपये में इतनी भयंकर गिरावट क्यों आई है।
रुपये में गिरावट के 4 बड़े कारण
कच्चे तेल (Crude Oil) में अचानक उछाल: ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों के कारण मिडिल ईस्ट में भारी तनाव है। इस वजह से कच्चे तेल के दाम आसमान छू रहे हैं। बुधवार 4 मार्च को ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 1% से ज्यादा बढ़कर 82.32 डॉलर प्रति बैरल हो गया। इससे पहले 3 मार्च को तो यह लगभग दो साल में पहली बार 85 डॉलर के पार चला गया था।
होर्मुज स्ट्रेट से सप्लाई रुकने का डर: दुनिया की कुल तेल और LNG सप्लाई का लगभग 20% हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) से होकर गुजरता है। युद्ध के हालात बनने से निवेशकों में डर है कि यह सप्लाई चेन टूट सकती है।
विदेशी निवेशकों (FPIs) की भारी निकासी: विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित जगहों (Safe-Haven Assets) पर लगा रहे हैं। सिर्फ सोमवार 2 मार्च को ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 350 मिलियन डॉलर से ज्यादा की रकम निकाल ली।
डॉलर का लगातार मजबूत होना: दुनिया भर में फैले डर (Global Risk-Off Sentiment) के कारण लोग डॉलर खरीद रहे हैं। कमजोर यूरो के चलते डॉलर इंडेक्स तीन महीने के अपने सबसे ऊंचे स्तर 98.41 पर पहुंच गया है। डॉलर जितना मजबूत होगा, रुपया उतना ही कमजोर होगा।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
HDFC सिक्योरिटीज के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट, दिलीप परमार के मुताबिक, "ईरान संकट के बाद तेल की कीमतों में आई तेजी ने रुपये की कमर तोड़ दी है। घबराए हुए निवेशक अब सुरक्षित निवेश (सेफ़-हेवन एसेट्स) की तलाश कर रहे हैं। विदेशी पैसे का बाहर जाना और भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ने की चिंता रुपये पर भारी दबाव डाल रही है।"
वहीं, DBS बैंक की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर के उछाल से भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) GDP का लगभग 0.35% बढ़ सकता है। इतना ही नहीं, इससे आम आदमी पर भी महंगाई की मार पड़ेगी और महंगाई दर 20 से 30 बेसिस पॉइंट्स तक बढ़ सकती है।
आम आदमी और घरेलू बाजार पर क्या होगा असर?
कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से भारत को तेल मंगाने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ेंगे। तेल रिफाइनरियों की तरफ से डॉलर की मांग और बढ़ेगी, जिससे रुपये में और गिरावट आ सकती है। सीधा सा गणित है, अगर तेल महंगा होगा, तो ट्रांसपोर्टेशन महंगा होगा और इसका सीधा असर आम आदमी की रोजमर्रा की चीजों (सब्जी, दूध, राशन) की कीमतों पर पड़ेगा, यानी महंगाई और बढ़ेगी।

