Indian Pharma Export: इजराइल-ईरान युद्ध से माल ढुलाई दोगुनी महंगी हो गई है। इससे भारतीय फार्मा निर्यातकों को इस महीने 5000 करोड़ रुपये तक के भारी नुकसान का डर सता रहा है।
नई दिल्लीः पश्चिम एशिया (वेस्ट एशिया) में भड़के इजराइल और ईरान के युद्ध का सीधा असर अब भारतीय व्यापार पर दिखने लगा है। खाड़ी देशों में दवा सप्लाई करने वाली भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं। युद्ध के कारण माल ढुलाई (लॉजिस्टिक्स) का खर्च इतना ज्यादा बढ़ गया है कि दवा निर्यातकों को सिर्फ इसी महीने 2500 से 5000 करोड़ रुपये तक का भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
अगर यह शिपमेंट रुकता है, तो भारत की उन कंपनियों को सबसे तगड़ी चोट लगेगी जो UAE, सऊदी अरब, ओमान और कुवैत जैसे देशों को जेनेरिक और सस्ती दवाएं बेचती हैं।
क्यों बढ़ रहा है खर्च और नुकसान का डर?
फार्मास्यूटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (फार्मेक्सिल) ने इस संकट को लेकर सख्त चेतावनी जारी की है। युद्ध के कारण समंदर और हवा के रास्ते माल भेजने का किराया (फ्रेट रेट) लगभग दोगुना हो गया है।
भारी सरचार्ज: निर्यातकों को अब हर शिपमेंट पर 4000 से 8000 डॉलर तक का एक्स्ट्रा सरचार्ज चुकाना पड़ रहा है।
महंगा इंश्योरेंस: युद्ध के खतरे को देखते हुए इंश्योरेंस कंपनियों ने प्रीमियम काफी बढ़ा दिया है।
लंबे रास्ते: सुरक्षित रास्तों से जहाज ले जाने के कारण समय ज्यादा लग रहा है और ईंधन (फ्यूल) का खर्च भी आसमान छू रहा है।
फार्मेक्सिल के चेयरमैन नमित जोशी ने बताया कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और माल पहुंचने के अनिश्चित समय के कारण एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट (API) मंगाने की लागत भी बढ़ गई है। इससे छोटी और मध्यम आकार की फार्मा कंपनियों के कामकाज और बजट पर भारी दबाव आ गया है।
युद्ध से कैसे बिगड़े हालात?
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ खुली जंग का ऐलान करते हुए एयर स्ट्राइक की। इसका पलटवार करते हुए ईरान ने भी इजराइल और मिडिल ईस्ट के कई देशों पर हमले किए। इस उथल-पुथल का सीधा असर कच्चे तेल पर पड़ा है।
हमलों के बाद से ब्रेंट क्रूड ऑयल में 16 प्रतिशत का भारी उछाल आया है। 6 मार्च की सुबह यह 84 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रहा था।
महत्वपूर्ण जलमार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' पर संकट
इस जंग ने दुनिया के सबसे अहम जलमार्गों में से एक 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के ट्रैफिक को बुरी तरह प्रभावित किया है। आपको बता दें कि भारत का 50 प्रतिशत तेल और लगभग 80 प्रतिशत नेचुरल गैस इसी रास्ते से होकर आती है। इसके अलावा रेड सी और खाड़ी के अन्य रास्तों पर भी खतरा मंडरा रहा है।
नमित जोशी के मुताबिक, रास्तों में देरी से सबसे बड़ा खतरा टेंपरेचर-सेंसिटिव दवाओं (जिन्हें कोल्ड-चेन में रखा जाता है) को है। अगर महंगी दवाएं तय समय पर नहीं पहुंचीं, तो उनका असर खत्म हो सकता है और कंपनियों को करोड़ों का माल फेंकना पड़ सकता है।
भारतीय दवाओं पर कितना निर्भर है मिडिल ईस्ट?
मिडिल ईस्ट और गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) के देश भारतीय दवा इंडस्ट्री के लिए एक बहुत बड़ा बाजार हैं। भारत इन देशों के लिए एक लाइफलाइन की तरह काम करता है।
- वित्तीय वर्ष 2021 में इस इलाके में भारत का फार्मा एक्सपोर्ट 1.32 अरब डॉलर था।
- वित्तीय वर्ष 2025 में यह आंकड़ा तेजी से बढ़कर 1.75 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
अब अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो न सिर्फ भारत को आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि खाड़ी देशों में सस्ती और जरूरी दवाओं की भारी किल्लत भी हो सकती है।
( डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी केवल मार्केट अपडेट्स और रिपोर्ट्स पर आधारित है। यह किसी भी प्रकार की वित्तीय सलाह या निवेश की राय नहीं है। क्रिप्टो मार्केट और शेयर बाजार जोखिमों के अधीन हैं। निवेश करने से पहले कृपया अपने वित्तीय सलाहकार से संपर्क जरूर करें।)

