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| Zoho Founder Sridhar Vembu Google Alphabet bond issue |
क्या हम एक बार फिर किसी नए तरह की गुलामी की तरफ बढ़ रहे हैं? फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार जंजीरें दिखाई नहीं देंगी.वे डेटा, टेक्नोलॉजी और डिजिटल कंट्रोल के रूप में होंगी।
यह सवाल किसी आम व्यक्ति ने नहीं, बल्कि Sridhar Vembu जैसे अनुभवी टेक उद्यमी ने उठाया है। उनका मानना है कि आज की बड़ी टेक कंपनियां सिर्फ बिजनेस नहीं कर रहीं, बल्कि धीरे-धीरे वैश्विक शक्ति का नया केंद्र बनती जा रही हैं।
क्या है पूरा मामला?
हाल ही में Google की पैरेंट कंपनी Alphabet Inc. ने बॉन्ड मार्केट से करीब 32 बिलियन डॉलर (करीब 3200 करोड़ डॉलर) जुटाए वो भी सिर्फ 24 घंटे में।
यह सिर्फ एक फाइनेंशियल डील नहीं थी, बल्कि इसने यह दिखाया कि निवेशकों का भरोसा अब सिर्फ सरकारों पर नहीं, बल्कि इन निजी कंपनियों पर भी उतना ही, या शायद उससे ज्यादा हो चुका है।
इसी घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए वेंबू ने कहा कि आज की Big Tech कंपनियां कई देशों से ज्यादा ताकतवर बन चुकी हैं. चाहे वो आर्थिक हो या रणनीतिक।
‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ से तुलना क्यों?
वेंबू की यह तुलना यूं ही नहीं है। East India Company भी शुरुआत में सिर्फ व्यापार करने भारत आई थी। लेकिन धीरे-धीरे उसकी ताकत इतनी बढ़ी कि उसने शासन तक अपने हाथ में ले लिया।
वेंबू का इशारा साफ है. आज की टेक कंपनियां भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ रही हैं, बस तरीका बदल गया है।
आज Amazon, Meta Platforms और Microsoft जैसी कंपनियों के पास इतना पैसा और डेटा है कि वे कई देशों की GDP के बराबर ताकत रखती हैं।
100 साल के बॉन्ड - भरोसे की नई परिभाषा
इस पूरे मामले में एक और दिलचस्प बात सामने आई. Alphabet ने 100 साल की अवधि वाले बॉन्ड जारी किए हैं।
सोचिए, जहां सरकारें आमतौर पर 30-40 साल के बॉन्ड जारी करती हैं, वहीं एक निजी कंपनी के लिए निवेशक 100 साल तक भरोसा दिखा रहे हैं। इसका मतलब साफ है. लोगों को यकीन है कि ये कंपनियां न सिर्फ टिकेंगी, बल्कि लगातार मुनाफा भी कमाती रहेंगी।
डेटा ही नई ताकत है
आज की दुनिया में असली ताकत जमीन या सोने में नहीं, बल्कि डेटा में है।
- हम क्या सर्च करते हैं
- किससे बात करते हैं
- कहां जाते हैं
ये सारी जानकारी Big Tech कंपनियों के पास है।
अगर पुराने समय में कर (Tax) वसूला जाता था, तो आज डेटा एक नया “डिजिटल टैक्स” बन चुका है।
खतरा कहां है?
वेंबू की चिंता के पीछे कुछ मजबूत कारण हैं:
1. बढ़ती निर्भरता
हम रोजमर्रा के कामों के लिए इन कंपनियों पर पूरी तरह निर्भर हो चुके हैं।
2. छोटे बिजनेस पर असर
छोटी कंपनियां या तो इन बड़ी कंपनियों में समा जाती हैं या फिर खत्म हो जाती हैं।
3. नीतियों पर प्रभाव
इतनी बड़ी कंपनियां सरकारों की नीतियों को भी प्रभावित कर सकती हैं।
दुनिया जाग रही है - फ्रांस का उदाहरण
हाल ही में France ने अपने सरकारी कामकाज में विदेशी ऐप्स जैसे Zoom और Teams को छोड़कर घरेलू प्लेटफॉर्म अपनाने का फैसला किया। वेंबू ने इस कदम की सराहना करते हुए कहा कि अब देश “डिजिटल संप्रभुता” की अहमियत समझने लगे हैं।
भारत के लिए क्या सीख?
भारत दुनिया के सबसे बड़े डेटा बाजारों में से एक है। अगर हम अपनी टेक्नोलॉजी और प्लेटफॉर्म विकसित नहीं करेंगे, तो हम हमेशा विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहेंगे।
हालांकि भारत ने Unified Payments Interface (UPI) और Open Network for Digital Commerce (ONDC) जैसे कदम उठाकर सही दिशा दिखाई है, लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी एक व्यापारिक समूह के पास असीमित ताकत आई है, उसका परिणाम आम जनता के लिए अच्छा नहीं रहा है। 24 घंटे में 3200 करोड़ जुटाना अल्फाबेट के लिए एक बिजनेस की सफलता हो सकती है, लेकिन दुनिया के लिए यह एक संकेत है कि शक्ति का संतुलन बिगड़ रहा है। श्रीधर वेंबू की ईस्ट इंडिया कंपनी वाली तुलना शायद थोड़ी कड़वी लगे, लेकिन यह भविष्य की एक ऐसी तस्वीर दिखा रही है जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। अब समय आ गया है कि देश और सरकारें अपनी 'डिजिटल सीमाओं' की सुरक्षा के बारे में गंभीरता से सोचें।

