SBI Research Report: भारत में FDI और FPI आउटफ्लो के आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है। SBI की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक FY27 में ट्रेड ग्रोथ धीमी रह सकती है। जानिए इकोनॉमी पर इसका पूरा असर।
![]() |
| FDI in India |
नई दिल्ली, 21 अप्रैलः भारत वर्तमान में दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन, हाल के कुछ आर्थिक आंकड़े और रिपोर्ट्स एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। जहाँ सरकार देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है, वहीं विदेशी निवेश (FDI) में आ रही गिरावट और देश से बाहर जाते पैसे (Outflow) ने विशेषज्ञों की माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
SBI रिसर्च की हालिया रिपोर्ट ने भारतीय अर्थव्यवस्था की एक 'मिली-जुली' तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले कुछ सालों में भारत को विदेशी मोर्चे पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसमें सबसे बड़ी चिंता विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) का बाहर जाना और शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Net FDI) का कम होना है।
ट्रेड ग्रोथ की सुस्त रफ्तार और बढ़ता घाटा
इकोनॉमी के लिए निर्यात (Export) किसी इंजन की तरह काम करता है, लेकिन आने वाले समय में इस इंजन की रफ्तार थोड़ी धीमी रह सकती है। SBI रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027 (FY27) में भारत का निर्यात केवल 5 से 5.5 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है। इसके उलट, हमारा आयात (Import) 6.5 से 7 प्रतिशत की दर से बढ़ सकता है।
जब आयात, निर्यात से ज़्यादा तेज़ी से बढ़ता है, तो 'व्यापार घाटा' (Trade Deficit) बढ़ जाता है। इसका सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की वैल्यू पर पड़ता है। रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट बना रहेगा, जबकि हम अपनी ज़रूरतों के लिए चीन पर सबसे ज़्यादा निर्भर रहेंगे। हालांकि, स्पेन और वियतनाम जैसे देशों के साथ नए व्यापारिक रिश्ते कुछ राहत दे सकते हैं।
FPI आउटफ्लो: 1991 के बाद का सबसे बड़ा झटका?
शेयर बाज़ार और बॉन्ड मार्केट में होने वाले विदेशी निवेश (FPI) को लेकर आंकड़े काफी चौंकाने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 (FY26) में भारत से लगभग 16.6 अरब डॉलर का FPI बाहर गया है। यह आंकड़ा साल 1991 के आर्थिक संकट के बाद से अब तक का सबसे बड़ा आउटफ्लो माना जा रहा है।
विदेशी निवेशकों का भारतीय बाज़ार से इस तरह पैसा निकालना वैश्विक अस्थिरता और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (जैसे ईरान-इजरायल संकट) की ओर इशारा करता है। हालांकि, राहत की बात यह है कि भारतीय निवेशकों और घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने बाज़ार को संभाले रखा है, जिससे 2008 की मंदी जैसा बड़ा क्रैश देखने को नहीं मिला।
FDI में लगातार गिरावट: क्यों जा रहा है पैसा बाहर?
किसी भी देश के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) बेहद जरूरी होता है। लेकिन भारत में 'नेट एफडीआई' (Net FDI) के आंकड़े पिछले पांच महीनों से निगेटिव बने हुए हैं। जनवरी 2026 में ही भारत से करीब 1.4 अरब डॉलर का नेट आउटफ्लो हुआ।
इसका एक बड़ा कारण यह है कि विदेशी कंपनियां भारत में नया निवेश करने के बजाय, यहां से अपना मुनाफा या पुराना निवेश वापस (Repatriation/Disinvestment) ले जा रही हैं।
आंकड़ों पर एक नज़र (अरब डॉलर में):
- FY 2021-22: कुल निवेश 84.8 | बाहर गया पैसा 28.6 | नेट FDI 38.6
- FY 2023-24: कुल निवेश 71.3 | बाहर गया पैसा 44.5 | नेट FDI 10.2
- FY 2024-25: कुल निवेश 80.6 | बाहर गया पैसा 51.5 | नेट FDI मात्र 1.0
इन आंकड़ों से साफ है कि निवेश तो आ रहा है, लेकिन उससे कहीं अधिक रफ़्तार से पैसा देश से बाहर निकल रहा है। इसके साथ ही, भारतीय कंपनियां भी अब विदेशों में अपना कारोबार बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं (Outward FDI), जो 2024-25 में बढ़कर 28.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।
इकोनॉमी पर क्या होगा असर?
रुपये पर दबाव: जब विदेशी मुद्रा (डॉलर) देश से बाहर जाती है, तो रुपये की वैल्यू गिरती है। इससे कच्चा तेल और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है।
रोजगार के अवसर: FDI कम होने का सीधा मतलब है कि नए कारखाने और स्टार्टअप्स को मिलने वाली फंडिंग में कमी आएगी, जिसका असर नौकरियों के सृजन पर पड़ सकता है।
इंडस्ट्रियल ग्रोथ: निवेश की कमी से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ़्तार धीमी हो सकती है, जो 'मेक इन इंडिया' जैसे अभियानों के लिए एक चुनौती है।
आगे की राह
SBI रिसर्च की रिपोर्ट भविष्य को लेकर थोड़ी सतर्क रहने की सलाह देती है। हालांकि, यह भी उम्मीद जताई गई है कि FY27 तक नेट एफडीआई बढ़कर 3 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। सरकार को अपनी नीतियों में और सुधार करने की ज़रूरत है ताकि विदेशी कंपनियों को भारत में पैसा लगाने और उसे यहीं बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
भारत की विशाल घरेलू मांग और मिडिल क्लास की बढ़ती आबादी अभी भी एक बड़ा प्लस पॉइंट है। अगर वैश्विक हालात सुधरते हैं और घरेलू स्तर पर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (Ease of Doing Business) को और बेहतर किया जाता है, तो भारत इस दबाव से बाहर निकल सकता है।


