Global Economy: मंदी, न सिर्फ महंगाई... आखिर क्या है वो आफत जिससे एक्सपर्ट्स की नींद उड़ गई है?

Keyur Raval

What is Stagflation: दुनियाभर के अर्थशास्त्री 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation) को लेकर बेहद चिंतित हैं। ईरान युद्ध और वैश्विक अस्थिरता के बीच क्या भारत और दुनिया मंदी और महंगाई की दोहरी मार झेलने वाले हैं? जानिए इस लेख में।


Global Economy Slowdown
Iran War Impact


नई दिल्ली, 19 अप्रैलः ईरान युद्ध के साये में वैश्विक अर्थव्यवस्था एक बड़े खतरे की ओर बढ़ रही है जिसे 'स्टैगफ्लेशन' कहा जाता है। यह वह स्थिति है जहां बाजार में विकास की रफ्तार सुस्त पड़ जाती है और महंगाई बेतहाशा बढ़ने लगती है। आईएमएफ और प्रमुख केंद्रीय बैंकों ने चेतावनी दी है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और ग्लोबल सप्लाई चेन में बाधाएं दुनिया को 1970 के दशक जैसे महासंकट में धकेल सकती हैं। रिजर्व बैंक (RBI) के सामने भी बड़ी चुनौती है कि वह विकास को बढ़ावा दे या महंगाई को रोके। आने वाले हफ्ते में आने वाले PMI और महंगाई के आंकड़े यह तय करेंगे कि क्या हम एक लंबी आर्थिक मंदी के मुहाने पर खड़े हैं। यह लेख स्टैगफ्लेशन के हर पहलू और आपकी जेब पर होने वाले असर का विस्तार से विश्लेषण करता है।


पिछले कुछ हफ्तों से वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) में जो हलचल मची है, उसने न केवल शांति प्रेमियों बल्कि दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों की भी नींद उड़ा दी है। ईरान और आसपास के क्षेत्रों में जारी संघर्ष को शुरू हुए लगभग 7 हफ्ते बीत चुके हैं, लेकिन शांति की कोई ठोस किरण दिखाई नहीं दे रही है। इस अनिश्चितता के बीच एक शब्द बार-बार गूंज रहा है ‘स्टैगफ्लेशन' (Stagflation)।


विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो दुनिया एक ऐसे आर्थिक चक्रव्यूह में फंस सकती है, जिससे निकलना दशकों तक मुश्किल हो सकता है। यह स्थिति रिजर्व बैंक (RBI) जैसे केंद्रीय बैंकों के लिए 'इधर कुआं, उधर खाई' जैसी बन गई है।


आखिर क्या है यह ‘स्टैगफ्लेशन' (Stagflation)?


साधारण शब्दों में कहें तो स्टैगफ्लेशन अर्थव्यवस्था की वह सबसे ‘खतरनाक' स्थिति है, जहां दो विपरीत समस्याएं एक साथ आकर खड़ी हो जाती हैं। आमतौर पर जब महंगाई बढ़ती है, तो माना जाता है कि अर्थव्यवस्था बढ़ रही है (Growth)। लेकिन स्टैगफ्लेशन में:


धीमी विकास दर (Slow Growth): जीडीपी (GDP) और औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार सुस्त पड़ जाती है।


बेकाबू महंगाई (High Inflation): जरूरी चीजों, खाने-पीने के सामान और ईंधन की कीमतें आसमान छूने लगती हैं।


जब ये दोनों चीजें एक साथ होती हैं, तो उसे स्टैगफ्लेशन कहते हैं। यह शब्द ‘Stagnation' (ठहराव) और ‘Inflation' (महंगाई) को जोड़कर बना है। विशेषज्ञों को डर है कि कहीं दुनिया 1970 के दशक वाले दौर में न लौट जाए, जब तेल के संकट ने पूरी दुनिया की कमर तोड़ दी थी।


संकट की असली जड़: कच्चा तेल और ऊर्जा


इस पूरे आर्थिक तनाव के पीछे सबसे बड़ा विलेन ‘कच्चा तेल' (Crude Oil) और ऊर्जा की बढ़ती कीमतें हैं। ईरान और मध्य-पूर्व के देशों में जब भी तनाव बढ़ता है, तेल की सप्लाई चेन प्रभावित होती है। तेल महंगा होने का मतलब है माल ढुलाई महंगी होना, फैक्ट्रियों में उत्पादन की लागत बढ़ना और अंततः आम आदमी की थाली का महंगा होना।


अमेरिका जैसे विकसित देशों के आंकड़ों को देखें तो वहां रिटेल बिक्री तो बढ़ रही है, लेकिन इसके पीछे की कहानी डराने वाली है। लोग सामान ज्यादा नहीं खरीद रहे, बल्कि पेट्रोल और डीजल की बढ़ी हुई कीमतों के कारण उन्हें ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है। इसका सीधा असर यह हो रहा है कि लोग अन्य जरूरी चीजों (जैसे कपड़े, गैजेट्स या लग्जरी) पर खर्च कम कर रहे हैं, जो अंततः आर्थिक विकास को धीमा कर रहा है।


IMF की गंभीर चेतावनी: ‘स्थाई अनिश्चितता' का दौर


इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) की एमडी क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि युद्ध के कारण होने वाला आर्थिक नुकसान काफी हद तक 'बेक्ड इन' (Baked-in) हो चुका है, यानी जो नुकसान होना था, वह शुरू हो चुका है और उसके परिणाम दिखने लगे हैं।


उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि भले ही आज युद्ध रुक जाए, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर आने में लंबा समय लगेगा। अब दुनिया को 'स्थाई अनिश्चितता' (Permanent Uncertainty) के बीच जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। यह बयान संकेत देता है कि आने वाले 2 से 5 साल आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।


केंद्रीय बैंकों का धर्मसंकट: ‘इधर कुआं, उधर खाई'


भारत के रिजर्व बैंक (RBI) से लेकर अमेरिका के फेडरल रिजर्व तक, सभी केंद्रीय बैंक इस समय बहुत पेचीदा स्थिति में हैं। उनके पास महंगाई को कंट्रोल करने का मुख्य हथियार ‘ब्याज दर' (Interest Rates) है, लेकिन स्टैगफ्लेशन में यह हथियार भी फेल होता दिखता है:


अगर ब्याज दरें घटाते हैं: तो बाजार में पैसा बढ़ेगा, जिससे विकास (Growth) को थोड़ा सहारा मिल सकता है, लेकिन इससे महंगाई और बेकाबू हो जाएगी।


अगर ब्याज दरें बढ़ाते हैं: तो महंगाई पर तो लगाम लग सकती है, लेकिन कर्ज महंगा होने के कारण बिजनेस ठप हो जाएंगे और आर्थिक विकास की रफ्तार और भी ज्यादा धीमी हो जाएगी।


जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देशों में पहले ही बिजनेस एक्टिविटी (PMI) घटने के संकेत मिल रहे हैं, जिससे वहां गहरी मंदी (Recession) का खतरा मंडरा रहा है।


आने वाला हफ्ता क्यों है अहम? इन 3 संकेतों पर रहेगी नजर


अगले कुछ दिनों में आने वाले आर्थिक आंकड़े यह तय करेंगे कि दुनिया किस दिशा में जा रही है। दुनिया के निवेशक और अर्थशास्त्री इन तीन चीजों पर नजरें गड़ाए हुए हैं:


PMI सर्वे (Purchasing Managers' Index): यह आंकड़ा बताएगा कि क्या बिजनेस और फैक्ट्रियों में उत्पादन कम हो रहा है? अगर PMI गिरता है, तो यह मंदी का पक्का संकेत होगा।


महंगाई के नए आंकड़े: ऊर्जा की लागत किस हद तक अन्य उपभोक्ता वस्तुओं (FMCG) के दाम बढ़ा रही है, इसकी स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी।


कंज्यूमर सेंटिमेंट (Consumer Sentiment): क्या आम आदमी महंगाई के डर से सहमा हुआ है? क्या उसने भविष्य की अनिश्चितता को देखते हुए अपनी जेब कस ली है?


क्या है बचने का रास्ता?


स्टैगफ्लेशन से निपटना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होता। इसके लिए उत्पादन बढ़ाना, सप्लाई चेन को दुरुस्त करना और तेल पर निर्भरता कम करना ही दीर्घकालिक उपाय हैं। फिलहाल, दुनिया के लिए सबसे बड़ी उम्मीद शांति बहाली है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो 2024 और 2025 का साल वैश्विक अर्थव्यवस्था के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज हो सकता है। आम निवेशकों और नागरिकों के लिए सलाह यही है कि वे अपनी फिजूलखर्ची पर नियंत्रण रखें और निवेश के मामले में सतर्क रहें।


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