खेती पर मंडराया संकट! 13 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा खाद उत्पादन, क्या फिर महंगे होंगे अनाज?

Keyur Raval

Fertilizer Production India 2026: भारत में खाद उत्पादन 13 साल के निचले स्तर पर पहुँच गया है। मार्च 2026 में आई 24.6% की भारी गिरावट ने कृषि क्षेत्र और किसानों की चिंता बढ़ा दी है। पूरी रिपोर्ट यहाँ पढ़ें।


Fertilizer Production India 2026
Indian Agriculture Impact

 

नई दिल्ली, 24 अप्रैलः भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए एक चिंताजनक खबर सामने आ रही है। देश के आठ प्रमुख उद्योगों (Core Industries) के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत का उर्वरक या खाद उत्पादन (Fertilizer Production) पिछले 13 वर्षों में अपने सबसे खराब दौर से गुजर रहा है। मार्च 2026 में उत्पादन में 24.6% की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई, जिसने पूरे साल के विकास दर को नकारात्मक (Negative Zone) में धकेल दिया है। LNG आपूर्ति में बाधा और प्लांट में मेंटेनेंस के काम को इस गिरावट का मुख्य कारण माना जा रहा है। इसका सीधा असर रबी और खरीफ की फसलों पर पड़ सकता है। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि खाद उत्पादन घटने के पीछे के तकनीकी कारण क्या हैं, यूरिया का उत्पादन कितना कम हुआ है और आने वाले समय में भारतीय किसानों और खाद्य सुरक्षा पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।


भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ की अर्थव्यवस्था की नींव खेतों में लहलहाती फसलों पर टिकी है। लेकिन हाल ही में आए सरकारी आंकड़े देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों की मेहनत पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। भारत के आठ प्रमुख बुनियादी उद्योगों (Core Sectors) में से एक, 'खाद उद्योग' (Fertilizer Industry) से एक बेहद परेशान करने वाली रिपोर्ट सामने आई है।


ताजा आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का खाद उत्पादन 13 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। साल भर की मेहनत और पिछले सालों की बढ़त के बाद, इस अचानक आई गिरावट ने कृषि विशेषज्ञों और सरकार की नींद उड़ा दी है। खासकर मार्च 2026 के महीने में जो गिरावट देखी गई, उसने पिछले 14 सालों के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।


आंकड़ों की जुबानी: 13 साल का सबसे बुरा दौर


देश के औद्योगिक सूचकांक के विश्लेषण से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान खाद उत्पादन में पिछले वर्ष की तुलना में 0.1% की कमी आई है। हालांकि यह संख्या देखने में छोटी लग सकती है, लेकिन जब हम इसकी गहराई में जाते हैं, तो पता चलता है कि यह वित्त वर्ष 2013 के बाद की पहली वार्षिक गिरावट है।


Agriculture Economy India


याद दिला दें कि वित्त वर्ष 2013 में उत्पादन में 3.3% की गिरावट देखी गई थी। उसके बाद से खाद उत्पादन लगातार बढ़ रहा था या स्थिर था। उदाहरण के तौर पर:


  • वित्त वर्ष 2024: उत्पादन में 3.7% की वृद्धि हुई थी।
  • वित्त वर्ष 2025: उत्पादन में 2.9% की वृद्धि दर्ज की गई थी।


लेकिन वित्त वर्ष 2026 में यह वृद्धि दर न केवल रुकी, बल्कि नकारात्मक क्षेत्र (-0.1%) में चली गई। यह पिछले 13-14 वर्षों के औसत विकास दर 2.1% के बिल्कुल विपरीत है।


मार्च 2026: एक ऐसा महीना जिसने गणित बिगाड़ दिया


इस पूरी गिरावट की सबसे बड़ी वजह मार्च 2026 का महीना रहा। आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 में खाद उत्पादन में 24.6% की भारी गिरावट दर्ज की गई। अप्रैल 2012 में जब से मासिक उत्पादन की निगरानी (Monitoring) शुरू हुई है, तब से लेकर अब तक यह किसी भी एक महीने में होने वाली सबसे बड़ी गिरावट है।


हैरानी की बात यह है कि 14 साल के इस लंबे अंतराल में मार्च के महीने में कभी भी 15% से ज्यादा की गिरावट नहीं देखी गई थी। यहाँ तक कि 2020 में जब पूरी दुनिया 'कोरोना महामारी' और लॉकडाउन से जूझ रही थी, तब भी खाद उत्पादन में इतनी बड़ी गिरावट नहीं आई थी जितनी मार्च 2026 में दर्ज की गई है।


गिरावट के पीछे के मुख्य कारण: LNG और मेंटेनेंस


उद्यमियों और उद्योग जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे कोई एक कारण नहीं, बल्कि कई तकनीकी और वैश्विक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं।


LNG आपूर्ति में बाधा: यूरिया खाद के उत्पादन के लिए तरल प्राकृतिक गैस (LNG) एक अनिवार्य कच्चा माल है। मार्च के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर या पाइपलाइन ग्रिड में आई समस्याओं के कारण LNG की आपूर्ति में भारी रुकावट आई।


सालाना जड़त्व और मरम्मत (Maintenance): गैस की कमी होने के कारण देश के अधिकांश बड़े यूरिया प्लांट को ‘एनुअल मेंटेनेंस' (वार्षिक जड़त्व) के लिए बंद करना पड़ा। जब गैस ही उपलब्ध नहीं थी, तो कंपनियों ने इस समय का उपयोग अपने प्लांट की मरम्मत के लिए करना उचित समझा।


कच्चे माल की कमी: यूरिया के अलावा फास्फोरस और पोटेशियम खादों के उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में भी बाधाएं देखी गईं।


यूरिया, फास्फोरस और पोटेशियम: उत्पादन के चौंकाने वाले आंकड़े


खाद उत्पादन में आई इस कमी का सबसे ज्यादा असर यूरिया पर पड़ा है, जो भारतीय किसानों की सबसे पहली पसंद है।


यूरिया उत्पादन: आमतौर पर भारत हर महीने 2 से 2.5 मिलियन टन यूरिया का उत्पादन करता है। लेकिन मार्च 2026 में यह घटकर केवल 1.8 मिलियन टन रह गया। यह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 27% की कमी है।


P&K खाद (फास्फोरस और पोटेशियम): इन खादों का उत्पादन भी मार्च 2026 में लगभग 9 से 10 मिलियन टन के आसपास रहा, जो मार्च 2025 की तुलना में 16% से 24% तक कम है।


मुख्य तथ्य और हाइलाइट्स  


  • वित्त वर्ष 2025-26 में उत्पादन दर -0.1% रही।
  • 13 साल बाद पहली बार वार्षिक उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई।
  • मार्च 2026 में 24.6% की ऐतिहासिक मासिक गिरावट आई।
  • यूरिया उत्पादन में 27% की भारी कमी देखी गई।
  • LNG (प्राकृतिक गैस) की कमी को गिरावट की मुख्य वजह बताया गया।
  • वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही में भी उत्पादन सुस्त रहा था।


भारतीय कृषि और किसानों पर क्या होगा असर?


खाद उत्पादन में गिरावट का सीधा मतलब है बाजार में खाद की उपलब्धता कम होना। यदि समय रहते इसकी भरपाई नहीं की गई, तो इसके कई गंभीर परिणाम हो सकते हैं:


फसलों की पैदावार में कमी: समय पर खाद न मिलने से फसल की गुणवत्ता और मात्रा दोनों प्रभावित होती हैं।


कालाबाजारी का डर: जब भी बाजार में किसी चीज की कमी होती है, तो उसकी जमाखोरी और कालाबाजारी शुरू हो जाती है। छोटे किसानों को ऊंचे दामों पर खाद खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।


आयात पर निर्भरता: घरेलू उत्पादन कम होने पर सरकार को विदेशों से खाद मंगवानी पड़ेगी। इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ेगा और सरकारी सब्सिडी का बोझ भी बढ़ेगा।


महंगाई की मार: अगर खेती की लागत बढ़ती है, तो अनाज, सब्जियों और फलों के दाम बढ़ना तय है, जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा।


विशेषज्ञों का विश्लेषण  


कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को खाद के मामले में 'आत्मनिर्भर' बनने की दिशा में अभी और काम करने की जरूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार, "मार्च में उत्पादन में आई यह कमी केवल एक महीने की समस्या नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि हमारी खाद इकाइयां कच्चे माल (LNG) के लिए वैश्विक बाजार पर कितनी अधिक निर्भर हैं। सरकार को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और 'नैनो यूरिया' (Nano Urea) जैसे नवाचारों को और तेजी से बढ़ावा देना चाहिए।"


भविष्य की राह और सरकारी कदम


हालांकि स्थिति गंभीर है, लेकिन सरकार ने भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं। बंद पड़े खाद कारखानों को फिर से शुरू करने और नए प्लांट लगाने की योजना पर काम चल रहा है। साथ ही, ओमान और कतर जैसे देशों के साथ लंबी अवधि के गैस समझौतों (Gas Contracts) पर भी चर्चा हो रही है ताकि भविष्य में उत्पादन न रुके।


वित्त वर्ष 2026-27 के लिए लक्ष्य रखा गया है कि घरेलू उत्पादन को बढ़ाकर आयात को न्यूनतम स्तर पर लाया जाए। यदि मानसून अच्छा रहता है और खाद की आपूर्ति समय पर बहाल हो जाती है, तो कृषि क्षेत्र इस झटके से उबर सकता है।


खाद उत्पादन में 13 साल के निचले स्तर की गिरावट भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए एक चेतावनी है। मार्च 2026 के आंकड़ों ने स्पष्ट कर दिया है कि औद्योगिक बुनियादी ढांचा अभी भी बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील है। किसानों को संकट से बचाने और खाद्य कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए सरकार को न केवल उत्पादन बढ़ाना होगा, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला को भी मजबूत करना होगा। आने वाले महीनों में खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस कमी की भरपाई कैसे करती है।


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