![]() |
| RBI guidelines for banks: बैंक कर्मचारियों को बीमा, म्यूचुअल फंड जैसे थर्ड-पार्टी उत्पाद बेचने पर मिलने वाला इंसेंटिव अब बंद होगा। |
कभी ऐसा हुआ है कि आप बैंक में सिर्फ लोन लेने गए हों और सामने से बीमा पॉलिसी खरीदने का दबाव आने लगे? या फिर एफडी कराने पहुंचे हों और आपको कोई म्यूचुअल फंड स्कीम थमा दी गई हो? अगर हां, तो यह खबर आपके लिए राहत लेकर आई है।
भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI ने बैंकों की इस तरह की मिस-सेलिंग यानी भ्रामक बिक्री पर लगाम लगाने के लिए कड़े नियम प्रस्तावित किए हैं। इसका सीधा मकसद है ग्राहकों को गलत सलाह, दबाव और छिपी हुई शर्तों से बचाना।
मिस-सेलिंग आखिर है क्या?
जब बैंक या उसका कर्मचारी आपको किसी वित्तीय उत्पाद के बारे में पूरी और सही जानकारी दिए बिना उसे बेच दे, तो इसे मिस-सेलिंग कहा जाता है। कई बार ग्राहक की जरूरत कुछ और होती है, लेकिन उसे ऐसा प्रोडक्ट दे दिया जाता है जो उसके लिए उपयुक्त ही नहीं होता।
उदाहरण के तौर पर, किसी रिटायर व्यक्ति को लंबी अवधि वाला इक्विटी म्यूचुअल फंड बेच देना, एफडी के नाम पर यूलिप प्लान थमा देना या लोन के साथ जबरन महंगा बीमा जोड़ देना — ये सब मिस-सेलिंग के उदाहरण हैं।
RBI ने क्या बदलाव प्रस्तावित किए हैं?
RBI के नए ड्राफ्ट नियम ग्राहकों को पहले से ज्यादा सुरक्षा देते हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि बैंक कर्मचारियों को अब बीमा, म्यूचुअल फंड या दूसरे थर्ड-पार्टी उत्पाद बेचने पर मिलने वाला इंसेंटिव या कमीशन बंद हो सकता है। इससे सेल्स का दबाव कम होगा और ग्राहक को उसकी जरूरत के हिसाब से सलाह मिलने की उम्मीद बढ़ेगी।
अगर कोई बैंक गलत जानकारी देकर या धोखे से कोई प्रोडक्ट बेचता है, तो उसे केवल रकम वापस नहीं करनी होगी, बल्कि ग्राहक को हुए नुकसान की भरपाई भी करनी पड़ सकती है। यह बदलाव बैंकों को ज्यादा जिम्मेदार बनाएगा।
अब जबरदस्ती की बिक्री नहीं चलेगी
कई बार बैंक किसी लोन या सेवा के साथ दूसरा प्रोडक्ट जोड़कर बेच देते हैं। जैसे, “अगर बीमा नहीं लोगे तो लोन नहीं मिलेगा।” RBI ने साफ कर दिया है कि अब इस तरह की बंडलिंग नहीं चलेगी।
अगर किसी स्थिति में किसी प्रोडक्ट को किसी दूसरे विकल्प के साथ जोड़ा भी जाता है, तो ग्राहक को यह साफ विकल्प मिलना चाहिए कि वह वही प्रोडक्ट किसी दूसरी कंपनी से भी ले सकता है।
डार्क पैटर्न पर भी रोक
RBI ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल होने वाले डार्क पैटर्न पर भी रोक लगाने की बात कही है। यानी ऐसे डिजाइन ट्रिक्स, जिनसे ग्राहक को भ्रमित किया जाए या उसे बिना जाने कोई विकल्प चुनने पर मजबूर किया जाए, अब स्वीकार नहीं किए जाएंगे।
शिकायत दर्ज करने के नियम भी आसान होंगे
अगर किसी ग्राहक को लगता है कि उसके साथ मिस-सेलिंग हुई है, तो वह हस्ताक्षरित नियम और शर्तों की कॉपी मिलने के 30 दिनों के भीतर शिकायत दर्ज करा सकेगा। यह समयसीमा ग्राहकों के लिए एक बड़ी राहत मानी जा रही है।
इसके अलावा, बैंक ग्राहक की स्पष्ट सहमति के बिना उसके नाम पर कोई लोन या क्रेडिट सुविधा जारी नहीं कर पाएगा।
इन नियमों की जरूरत क्यों पड़ी?
पिछले कुछ वर्षों में बैंकिंग सेक्टर में शिकायतें बढ़ी हैं कि ग्राहकों को उनकी जरूरत से अलग उत्पाद बेचे गए। खुद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इस मुद्दे पर बैंकों को चेतावनी दी थी कि वे अपने मुख्य काम यानी बैंकिंग पर ध्यान दें, न कि सिर्फ कमीशन के लिए उत्पाद बेचते रहें।
RBI का यह कदम उसी दिशा में एक मजबूत पहल है। इससे बैंकिंग सिस्टम में पारदर्शिता बढ़ेगी और ग्राहकों का भरोसा भी मजबूत होगा।
आखिरकार ग्राहक ही सबसे ऊपर
अगर ये नियम लागू हो जाते हैं, तो आम ग्राहकों के लिए यह बड़ी राहत होगी। अब बैंकिंग संबंध सिर्फ बिक्री का खेल नहीं रहेगा, बल्कि उसमें ग्राहक की जरूरत और उसकी सहमति को सबसे ऊपर रखा जाएगा।
यह बदलाव बैंकिंग सेक्टर के लिए भले ही चुनौतीपूर्ण हो, लेकिन लंबे समय में यह ग्राहकों के हित में होगा। साफ संदेश यही है कि अब बैंकिंग में ग्राहक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

